आचार्यश्री के जीवन में कभी भी आडंबर या दिखावा नहीं था। निर्मोह सागर महाराज
गुना
पर्युषण पर्व के तीसरे दिन मुनिश्री 108निर्मोह सागर महाराज ने उत्तम आर्जव धर्म पर गहन प्रवचन दिया।इस दिन की विशेषता आचार्यश्री विद्यासागर के जीवन के उदाहरणों में छिपी आर्जव (सादगी) की महानता थी। मुनिश्री ने बताया कि आचार्यश्री के जीवन में कभी भी आडंबर या दिखावा नहीं था। चाहे वे किसी ढेड़े मेडे रास्ते पर चल रहे हों, उनके मार्ग में हमेशा सीधापन होता था।
मुनिश्री ने इस बात पर जोर दिया कि आर्जव धर्म ही वह मार्ग है, जिससे अहंकार को दूर किया जा सकता है और जीवन में सरलता आ सकती है। मुनिश्री ने बताया कि आर्जव ( सादगी ) का पालन करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है,बल्कि जीवन के हर पहलू में एक स्थिरता और अनुशासन आता है।


उन्होंने कहा, ‘धर्म तब सार्थक होता है जब वह आत्मकल्याण की
भावना से किया जाए, न कि प्रदर्शनऔर दिखावे के लिए।’ उन्होंने
भव्य और अभव्य की पहचान के विषय में भी विस्तार से बताया।
मुनिश्री ने कहा कि जो अपने जीवन मैं सही तरीके से समय, धन और साधनों का उपयोग करते हैं, जबकि अभव्य वे होते हैं, जो इनका दुरुपयोग करते है।
मुनिश्री निर्मोह सागर महाराज ने बताया कि धर्म तब ही सार्थक होता है जब वह आत्मकल्याण की भावना से किया जाए। आडंबर और दिखावे से बचकर हमेंखुद को शुद्ध और पवित्र बनाने के प्रयास करने चाहिए। धर्म का पालन केवल आत्मा की शुद्धि के लिए करना चाहिए, न कि दूसरों को दिखाने के लिए। यही सच्चा धर्म होता है, जो हमें और मोक्ष की ओर ले जाता है। उनके अनुसार,आर्जव धर्म अपनाकर व्यक्ति आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ सकता है।

इसके बाद मुनिश्री ने बलिप्रथा को घोर हिंसा करार दिया और कहा कि किसी भी प्रथा में हिंसा का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
