कपट करने से किसी का कल्याण नहीं होता है।आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

धर्म

कपट करने से किसी का कल्याण नहीं होता है।आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

रामगंजमंडी 

दस लक्षण पर्व के तीसरे दिन को उत्तम आर्जव धर्म के रूप में मनाया गया। इस बेला में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो कुछ न चाहता हो अगर अपने आप से प्रश्न करें कि मैं क्या चाहता हूं तो उतर आएगा खुशी चाहता हूं। ढूंढो खुशी कहां मिलेगी। महाराज श्री ने बताया कि खुशी का एक ही माध्यम है धर्म जो मंदिर में नहीं मिलता वह हमारे हृदय में बसता है। 

 

 

   

 

        पर्व हमें समझा रहे हैं कि बिना लक्षणों के धर्म नहीं होता है। 

आचार्य भगवान ने कहा कि धर्म लक्षणों के साथ होता है हम 355 दिन धर्म करते हैं लेकिन 10 लक्षणों को याद नहीं करते हैं। यह कोई नहीं सोचता कि 10 लक्षण मेरे धर्म है। पर्व हमें समझा रहे है कि बिना लक्षणों के धर्म नहीं होता। एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि मिट्टी का रसगुल्ला तो नहीं बनता यह 10 दिनों के लिए लक्षण नहीं है यह पूरे 365 दिनों के लिए लक्षण हैं। हमने इन्हें बुद्धि के कारण 10 दिनों में समेट दिया है। इ यह लक्षण साथ में आते हैं तो आर्जव धर्म भी हमारे साथ आता है। आर्जव धर्म पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि कपट करने से किसी का कल्याण नहीं होता है। इनसे आत्महित बिल्कुल नहीं होता है।

 

 

 

 

 

 

  जितने सरल स्वभावी होंगे उतनी बहु संपदा मिलेगी जरूरी नहीं है संपदा राष्ट्र से मुद्रित होआचार्य श्री ने कहा जितना हमारा स्वभाव सरल होगा उतनी बहु संपदा मिलेगी जरूरी नहीं है कि वह संपदा राष्ट्र से मुदित हो। भारत सरकार ने मोहर लगा दी यह नोट हो गया यह सिक्का हो गया। जरूरी नहीं है कि वह संपदा हो जो हमारे आत्म धर्म ने स्वीकार कर लिया वह बहु संपदा है। कपट के विषय में कहा यह बहुत छोटा शब्द है जिसके मन में आता है वह दूसरे का कबाड़ा कर देता है। दूसरे का कबाड़ा होता है सामने वाला उसका भी कबाड़ा करने को तैयार हो जाता है।

 

 

छल कपट का परिणाम अच्छा नहीं होता 

   आचार्य श्री ने कहा कि छल कपट का परिणाम कभी भी अच्छा नहीं होता हो सकता है अभी हम बच जाए लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा कि हम घेरे में ना आए। जब भी कर्म उदय में आएंगे हमें उस छल का फल भोगना पड़ेगा।

     

 

भेद विज्ञान की दृष्टि होनी चाहिए 

आचार्य श्री ने कहा कि भेद विज्ञान की दृष्टि होनी चाहिए इसका भावार्थ समझाते हुए कहा कि शरीर अलग है और मैं अलग हूं। यह दृष्टि धर्मात्मा की होती है। जब यह भेद आ जाता है तो समझ में आ जाता है कि धन और संपत्ति मुझसे अलग है। यह दृष्टि जब आत्मा में होती है छल कपट निकलता है तो आर्जव धर्म आत्मा में समाहित होता है। उन्होंने कहा कुछ नहीं करना चिंतन करना इसमें परिवर्तन करना चिंतन कुछ संभाषण कुछ क्रिया कुछ की कुछ होती है बस इसमें परिवर्तन करना

 

 यह हस्ताक्षर होना ही चाहिए कि मैं धर्मात्मा हूं 

उन्होंने कहा हर चीज के हस्ताक्षर जरुरी हैं पूरा पैसा देकर रजिस्ट्री पर हस्ताक्षर नहीं लिए तो प्रॉपर्टी तुम्हारी नहीं होगी उसी तरह यह हस्ताक्षर होना चाहिए कि मैं धर्मात्मा हूं जो मेरे मन में है वही वचन में है और जो वचन में है वही मेरी क्रिया में है। और कुछ नहीं चाहिए। जो मन में जो होता हम किसी को क्यों नहीं बता ऐसा क्यों होता है। जबकि मन में ऐसा होना चाहिए की हम सबको बता सके जो मन में है उसे सार्वजनिक कर सकते हैं तो आपको कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। उन्होंने कहा हमारे अंदर डर बैठ गया है और डर से ही छल कपट आता है। मायाचारी हो जाती है छिपना और छिपाना आ जाता है। जैन दर्शन कहता है छिपो न छिपाओ अगर ऐसा करते है तो व्यवहार बिगड़ जाएगा लेकिन धर्म तो बना रहेगा। छल किया तो धर्म बिगड़ जाएगा व्यवहार बिगड़ जाएगा। उन्होंने कहा छल से व्यवहार बन सकता है लेकिन जिस समय आप व्यवहार बनाने की कोशिश कर रहे थे उसे समय आपका धर्म नष्ट हो रहा था।

           

    छल का गड्ढा बहुत बड़ा है 

आचार्य श्री ने कहा कि छल का गड्ढा बहुत बड़ा है कितनी भी भरते जाओ यह कभी भरेगा नहीं। 

      अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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