निकलंक सागर महाराज का प्रथम समाधी दिवस मनाया गया
अशोकनगर
पूज्य मुनि श्री अक्षयसागर महाराज सानिध्य मे पूज्य मुनि श्री निकलंक सागर महाराज का प्रथम समाधी दिवस मनाया गया पूज्य मुनि श्री ने उनके जीवन पर प्रकाश डाला और कहा निकलंक सागर महाराज का प्रथम समाधी दिवस मनाया गया और कहा संसार में हर व्यक्ति जन्म लेता है और अगले भव की तैयारियां कर के चला जाता है। पिछले भव में हमने अच्छे कार्य किए हैं, इसलिए तो उच्च कुल मिला है। उन्होने गीता का उदाहरण देते हुए कहा गीता में लिखा है कि जो जन्मा है उसे एक दिन जाना पड़ेगा। वृक्ष पर पत्ते आकर पीले होने के बाद उन्हें गिरने से कोई नहीं रोक सकता। ऐसे ही हमारा जीवन है, पत्ते की तरह हमें देह छोड़ना पड़ेगी। यह बात सुभाष गंज में मुनिश्री निकलंक सागरजी महाराज के प्रथम समाधि दिवस समारोह को संबोधित करते हुए मुनिश्री अक्षय सागरजी महाराज ने कही।
सलेखना पर प्रकाश डाला
पूज्य मुनि श्री ने सलेखना पर प्रकाश डाला और कहा कि गृहस्थ विषय कषाय से ग्रसित रहता है। श्रावक को अंतम में और श्रमण को सल्लेखना कब लेना, कैसे लेना, इसका उल्लेख किया गया। जीने के साथ मरने की कला जैन दर्शन बताता है। अंत समय जागृति के साथ मरण करना बहुत कठिन है।
निकलंक सागरजी महाराज ने बहुत अच्छी तरह से समाधि ली
पूज्य मुनि श्री ने निकलंक सागरजी पर भाव भीनी वाणी के साथ कहा कि मुनि श्री निकलंक सागरजी महाराज ने बहुत अच्छी तरह से समाधि ली और अंतिम समय में आचार्य श्री ने मार्ग दर्शन किया ये बहुत बड़ी बात है। वीर मरण करने वाले बहुत कम होते हैं। जैन दर्शन में कई मुनि राज ने कठोर तपस्या करके हुए सल्लेखना करना ही जिनगुण से सम्पन्न कराना बहुत बड़ी बात है। जिस तरह से सेना में किसी भी समय आदेश आ सकता है, इसलिए सैनिक हर समय तैयार रहता है वैसे ही साधु दीक्षा ग्रहण करने के बाद हर पल समाधि की तैयारी करता रहता है।
निकलंक सागरजी उभरते साधक थे मुनि श्री शैल सागरजी
इस बेला मे शैल सागरजी महाराज ने भी भाव भीने उदगार प्रकट किये उन्होने कहा निकलंक सागरजी उभरते साधक थे आज का दिन किस रूप में स्वीकार कर रहे हैं जबसे मुनि राज दीक्षा लेते हैं तब ही से तैयारी प्रारंभ कर देते हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी संयम की साधना के लिए समाज के त्यागी व्रत का समर्पण और संस्कार थे कि वे सेवा में समर्पित रहे।
पूज्य मुनि श्री मे जोडने की कला थी
उन्होंने आगे कहा कि निकलंक सागरजी महाराज के पास लोगों को जोड़ने की कला थी और बहुत हद तक उसमें वे सफल रहे। किसी चीज को पाने के बाद छोड़ कर पुनः पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपनी साधना को बढ़ते रहेंगे और अंतिम समय करने में वे सफल रहे।
संकलित अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमंडी
