मंदिर ,तीर्थ क्षेत्र व धर्मस्थल बन रहे पिकनिक स्पॉट*धर्मस्थलों पर परिधानों की मर्यादा व धार्मिक अनुशासन की उड़ रही धज्जिया

धर्म

*मंदिर ,तीर्थ क्षेत्र व धर्मस्थल बन रहे पिकनिक स्पॉट*धर्मस्थलों पर परिधानों की मर्यादा व धार्मिक अनुशासन की उड़ रही धज्जिया

 

वर्तमान परिपेक्ष में जहां सब कुछ परिवर्तित होता जा रहा है वहां मंदिर व तीर्थों पर प्रवेश व दर्शन करने की परंपराओं में भी बहुत तेजी के साथ बदलाव हो रहा है। आज तीर्थ क्षेत्रों पर लोग धर्म कम पिकनिक मनाने अधिक जाते हैं और धर्म की मर्यादाये तार-तार हो रही हैं ।जब हमारे ही परिवार की बहू बेटियां हमारे ही समक्ष ऐसे परिधान पहन कर धर्म स्थल में प्रवेश करती हैं जो मर्यादा की हर हद को पार कर देती हैं। यहाँ अब इन सब बातो को इंगित करने व लिखने में भी डर लगने लगा है । लोग पक्का कहेंगे की आपकी मानसिकता बहुत ही छोटी व तुच्छ है । 

 

 

 

 

लेकिन यह बात यहां पर स्पष्टता के साथ लिखना चाहता हूं कि मंदिर में हम आखिर जाते क्यों है ? भगवान की भक्ति व आत्म शुद्धि करने के लिए या हम अपने फैशन को दिखाने के लिए या अन्य दर्शनार्थियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए मंदिर जाते हैं ।

जैन धर्म में जहाँ पंच महाव्रत व संयम साधना को पूरा मान दिया गया है , वहीं अपने कृत्य की यह बानगी क्या धर्म की मर्यादाओं को खंडित नहीं करती है ? माना कि आज युवा पश्चिमी सभ्यता से आकर्षित है , लेकिन कभी तो इस पर विचार कीजिए कि मंदिर और तीर्थ क्षेत्रों पर भी आप इस प्रकार अमर्यादित परिधान पहन कर जाना उचित है ? परिजनों की मानसिकता पर भी दया आती है जो यह सब चुप चाप सहन कर एक तरह से मौन रह कर कर्म बंध कर रहे हैं । परिवार को संस्कारित करने का प्रथम दायित्व परिजनों का है । परिजन ही युवाओं के आइकॉन होते है गुरु का नंबर उसके बाद आता है । यहां मैं यह भी इंगित करना चाहता हूं कि युवाओं को धर्म से जोड़ना अतिआवश्यक है केवल कुछ मर्यादाओं के साथ क्योकि युवा मन ज्यादा पाबंदियां सहन नहीं कर पाता है।

 

 

 

*लेखक ना तो नकारात्मक विचारों का व्यक्ति है ना ही संकीर्ण मानसिकता को धारण करने वाला* लेकिन फिर भी इस विषय पर उंगली जरूर उठाना आवश्यक है कि मंदिरों में प्रवेश करते समय कुछ नियमावली अवश्य होनी चाहिए। एक या दो क्षेत्रों पर यदि अमर्यादित परिधान पहनने वालों को मंदिरों में प्रवेश से रोक दिया जाये ( जैसे की बहुत से समाज के धार्मिक स्थल पर प्रवेश हेतु निर्धारित परिधान आवश्यक है ) तो निश्चित रूप से एक माइलस्टोन की स्थापना होगी। जिसकी इस समय महती आवश्यकता है ।समस्त जैन मंदिरों ,जैन तीर्थों पर अमर्यादित परिधानों को पहनकर प्रवेश रोकने हेतु आवश्यक रूप से कठोर नियमावली बननी चाहिए।

 

*रील का बढ़ रहा चलन*

नये युग का प्रारंभ हो रहा है वर्तमान में सोशल मीडिया का नशा सर चढ़कर बोल रहा है। ऐसी स्थिति में धर्मस्थलों व तीर्थ स्थलों पर पहुंचकर बड़ी मात्रा में रील बनाने का चलन बढ़ने लगा है जिससे क्षेत्र की मर्यादा धूमिल हो रही है। जिस पर भी चिंतन मनन और मंथन की अति आवश्यकता है। जिसका ताजा उदाहरण दिल्ली में मानस्तंभ पर जूते चप्पल पहने हुए हुआ फिल्मांकन है । किसी और पर उंगली उठाने से पहले स्वयं की तरफ भी देखना जरूरी है कि हम क्या कर रहे हैं। जैन धर्म के अनुयायी ही स्वयं तीर्थ क्षेत्र पर जाकर ऐसी रील बनाते हुए नजर आते हैं जिसमें महिलाओं की संख्या कुछ अधिक नजर आ रही है । 

 

आज वैसे ही जैन समाज कठिनाई के दौर से गुजर रहा है यह सब कुछ विचारणीय है। उसके साथ ही सुधारणीय भी है। जिसकी की सख्त आवश्यकता है । 

उत्तम क्षमा के साथ *संजय जैन बड़जात्या कामां राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंत्री जैन पत्रकार महासंघ*

 

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