निर्दोष, निर्विकल्प, निर्विकार, निष्कलंक भाव वात्सल्य है। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज

धर्म

निर्दोष, निर्विकल्प, निर्विकार, निष्कलंक भाव वात्सल्य है। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने वात्सल्य अंग पर विशेष प्रकाश डाला उन्होंने कहा दूध को किसी भी बर्तन में रख दो सोने के में रख दो चांदी के में रख दो, लेकिन दूध नहीं बदलेगा दूध तो दूध रहेगा। उसी प्रकार वात्सल्य वात्सल्य होना चाहिए चाहे वह मित्र के सामने हो या शत्रु के सामने हो। मतलब यह अहसास कराना की अभी भी मैं तुम्हारा हु। वात्सल्य का अर्थ होता है अहसास कराना। होगे तुम मेरे मित्र होंगे तुम मेरे शत्रु लेकिन अभी भी मैं तुम्हारा हु। तुम्हारे लिए दया, करूणा, उपकार करने के लिए मैं तैयार हूं। इसी का नाम वात्सल्य है।

 

 

मोह और प्रेम दोनो अलग चीजें हैं।
आचार्य श्री ने मोह और प्रेम के विषय में कहा कि मोह और प्रेम यह दोनों अलग चीजें हैं। मोह का मतलब स्वार्थ, वासनाए, और कुसंस्कार होता है। मोह जब भी जाग्रत होगा इन्हीं को लेकर जाग्रत होगा। यह मेरा तेरा लेकर आएगा। जैन दर्शन कहता है मोह तो हमें करना ही नहीं चाहिए। क्योंकि मोह के जाने पर राग और द्वेष यह दोनों चीजें भी चली आ जाती है। प्रेम का अर्थ होता है निस्वार्थ वात्सल्य यह सबसे हो सकता है,लेकिन मोह व्यक्तिगत होता है। प्रेम सार्वजनिक होता है। इसमें वासना और कुसंस्कार नहीं होता। अनुभव में आता है कोई चीज सार्वजनिक होती है तो उसमें राग नहीं होता कोई चीज व्यक्तिगत है तो राग हो जाएगा। घर के प्रति राग होगा लेकिन जिस नगर में आप रहते हैं वह सार्वजनिक है तो आपको राग नहीं होगा। राग मोह व्यक्तिगत वस्तु में होता है। प्रेम वात्सल्य सार्वजनिक वस्तु में होता है। प्रेम किसी से भी किया जा सकता है उसमें काले गोरे का व्यवहार नहीं होता। अच्छे बुरे का व्यवहार नहीं होता वह सार्वजनिक होता है उसका दृष्टिकोण सभी जीवो के प्रति मेरा प्रेम भाव है, सभी जीवो के प्रति मेरा मैत्री भाव है। प्रेम में खेद नहीं होता। मोह में दुख होता है मोह और प्रेम में बहुत बड़ा अंतर होता है। 

हमारी चर्या में हर जगह वात्सल्य प्रकट होना चाहिए
आचार्य श्री ने कहा हम कुछ भी करे हमारी हर चर्या में वात्सल्य का भाव होना चाहिए चाहे वो चेतन के प्रति हो या अचेतन के प्रति हो। जहां निस्वार्थ भाव से सेवा का भाव आ जाए समस्या के निवारण का भाव आ जाए निस्वार्थ भाव यह कहने लग जाए की हमें सामने वाले की मदद करना है तो वह वास्तविकता में वात्सल्य है। हम वात्सल्य तो बहुत दिखाते हैं लेकिन इसमें निस्वार्थता का ध्यान रखना हम कहे किसी से कहे हम आपके है लेकिन स्वार्थ नहीं होना चाहिए। आप बात मान लेते हो इसलिए काम कर देते हो इसलिए आपके हैं या एक धर्मात्मा है इसलिए हम आपके है। अगर यह भाव है कि जितने भी धर्मात्मा हैं हम उनके हैं तो प्रतिफल सेवा के लिए तैयार हैं उनकी हेल्प के लिए तैयार हैं तो यह वात्सल्य अंग है।

उन्होंने कहा वात्सल्य एक अलग चीज है अगर इसकी चिंतन की गहराई में जाते हैं तो यह निर्दोष, निर्विकल्प, निर्विकार, निष्कलंक भाव वात्सल्य है। उन्होंने कहा हम जैसे व्यापार, मकान, घर के कामों की योजना बनाते वैसे ही हमें अपने आपको समझाने की भी योजना बनानी चाहिए। जैसे ही हम हर काम का समय फिक्स करते हैं वैसे ही हमें धर्म का समय भी फिक्स्ड करना चाहिए। उन्होंने कहा यह कभी मत समझना धर्म का पाठ हाशिए वाला है। यह प्रारंभ वाला पाठ है। जीवन निर्वाह व्यापार आदि हाशिए वाले है। धर्म का पाठ यदि प्रारंभ में नहीं किया तो आप अंत में कर ही नहीं सकते। क्योंकि करने लायक ही नहीं बचेंगे। शत्रु मित्र समय समय पर हो सकते हैं लेकिन हर समय भी नहीं होने चाहिए। हमे सभी को सामान रूप से वात्सल्य देना चाहिए। वो देते है तो हम धर्मात्मा होते हैं।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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