जहां आध्यात्मिक विनय है, वहां विघटन नहीं होगा आचार्य कनकनदी

धर्म

जहां आध्यात्मिक विनय है, वहां विघटन नहीं होगा आचार्य कनकनदी

भीलूडा
ज्ञान विज्ञान दिवाकर आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भीलूड़ा शांतिनाथ जिनालय में अंतरराष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित करते हुए कहा कि जहां आध्यात्मिक विनय है,वहां विघटन नहीं होगा, लड़ाई झगड़ा नहीं होगा। अनंत सुख , अनंत ज्ञान, अनंत वीर्य प्राप्त करना हमारा धर्म है। विनय मोक्ष का द्वार है। लौकिक विनय तथा आध्यात्मिक विनय बाहर से समान दिखते हुए अंतरंग में महान अंतर है। गुणी का प्रकाश करना गुण गुणी का गुणानुवाद करना भी विनय गुण तथा गुणवान की प्रशंसा करना अनिवार्य हैं। गुरु प्रायश्चित देंगे तो हमें आनंदित होना चाहिए।

 

 

 

एक उदाहरण के माध्यम से बताया की जिस प्रकार डॉक्टर के उपचार से रोग दूर होने से रोगी आनंदित होता है।वैसे ही आचार्य के दंड देने पर शिष्य आनंदित होता है तो उससे शिष्यत्व गुण प्रकट होता है।आनंदित नहीं होने पर वह शिष्य तथा भक्त नहीं है। भक्ति युक्त भय, अनुशासन नहीं हो तो वह शिष्य नहीं है, विनयी नहीं है। साधु का क्या कर्तव्य क्या अकर्तव्य शिष्य का क्या कर्तव्य अकर्तव्य क्या करणीय क्या अकरणीय है वह साधु से श्रद्धा पूर्वक सुनना चाहिए। विनय से श्रुत आराधना चारित्र आराधना जिनवाणी आराधना होती हैं। विनय आत्म शुद्धि के लिए करना चाहिए। लोक प्रवर्तन हेतु काम भोग हेतु अर्थ विनय सभी संसार बढ़ाने के लिए हैं यह विनय भव हेतुक है धन संग्रह के लिए धर्म करे तो वह भववर्धक है आत्मा को शुद्ध करने के लिए आत्मा को परमात्मानंद बनाने के लिए आध्यात्मिक विनय है। इससे कोई तेरा मेरा वाद-विवाद कुछ भी नहीं होता है। आत्म शुद्धि से ज्ञान श्रद्धा विश्वास शांति तृप्ति गौरव बढ़ता है। अन्य के प्रति राग द्वेष नहीं होता है। आत्म शुद्धि से लाभ है, ज्ञान विनय, चरित्र विनय में परिणत होने पर आत्मा का विकास होता हैं। जिस प्रकार घोर अंधकार भी सूर्य उदय होने से नष्ट होता है, वैसे ही कर्म ज्ञान विनय से नष्ट होते हैं। कीचड़ को धोने के लिए शुद्ध जल चाहिए,वैसे ही पाप रूपी जल को धोने के लिए विनय रूपी जल चाहिए। जहां द्वंद अपमान विरोध बैरत्व है वहां विनय नहीं हैं।

विजय लक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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