काले रंग में नकारात्मक ऊर्जा होती है विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि काले रंग में नकारात्मक ऊर्जा होती है। काले रंग के कपड़े पहनकर मंदिर नहीं आना चाहिए। और ना ही कोई धार्मिक क्रिया करना चाहिए। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा इसमें नकारात्मक ऊर्जा होती है।
एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि अगर आपको किसी कमरे में बंद कर दें और वह काले रंग का हो तो आप घबरा जाओगे चिल्लाओगे ऐसा लगेगा। आपको अंधेरे से बचपन में भी डर लगता था और आज भी लगता है। काला रंग काली वस्तु काला विचार हमें नकारात्मक ऊर्जा देती है। और अगर हमारे भाव ही काले हो तो क्या होगा? दुनिया में इतने पक्षी है कौआ को कौन पसंद करता कोई नहीं करता वह भी तोते की तरह एक पक्षी है। लेकिन कौआ काला है काला रंग नकारात्मक ऊर्जा देता है इसलिए स्वाभाविक रूप से लोग उसे पसंद नहीं करते तो हम काले भावों को कैसे बना रहे हैं समझदार व्यक्ति काले परिणाम को स्वीकार नहीं कर सकता वह उन परिणाम को छोड़ने की कोशिश करेगा उनको अलग करने की कोशिश करेगा। 
व्यक्ति हिंसा झूठ चोरी परिग्रह में आनंद मानता है इनका आनंद कैसा होता है हम अच्छी तरह से समझ गए हैं फिर भी हम इन्हें छोड़ नहीं पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा प्रमाद यह है कि हम समझ ही नहीं पाते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। धर्म को धर्म की तरह से ही निर्वाह करना पड़ता है। नहीं तो अशुभ भाव उत्पन्न होगे उन्होंने कहा महत्वाकांक्षा किसी की भी कम नहीं है। दुर्योधन की भी महत्वाकांक्षा थी कि यह मेरे पिता का राज्य है मुझे मिलना चाहिए तुम दुर्योधन के पिता हो महत्वाकांक्षा में आपके अंदर भी यही भाव है कि भाई को थोड़ा कम मिल जाए मुझे ज्यादा मिल जाए।
महाराज श्री ने कहा नकारात्मक ऊर्जा हमारे पापों को विकृत करती है यह क्यों हो रही है इसके कारण को हम नहीं जानेंगे तो हम हटाने का प्रयास नहीं करते। महाराज श्री ने कहा अशुभ कार्य लापरवाही से होते हैं। हमें जब किसी के प्रति गुस्सा आता है तो जड़ से उखाड़ने का भाव आता है कहते हैं मर जाता तो अच्छा होता ना आप मरोगे न मारोगे लेकिन भाव अशुभ कर लिए अशुभ के भाव हमें नरक और शुभ के भाव हमें स्वर्ग एवं सिद्धालय तक ले जा सकता है। हमें अपने परिणामों पर और गति पर विचार करना होगा। गलत जगह जाए लेकिन भाव गलत नहीं होने चाहिए। सही जगह जाए तो भाव गलत नहीं होना चाहिए। अपने भावों को व्यवस्थित करना होगा।
हमें अपनी गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए हम क्या है हम दूसरे की गिरेबान में जाकर देखते हैं यदि हम अपनी गिरेबान में झांक कर देखेंगे तो सुधर सकते हैं। लेकिन हमारी आदत दूसरों को देखने की है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312








