जहां-जहां धर्म‎ होता है, वहां अहिंसा का पालन‎ होता है और जहां-जहां अधर्म‎ ‎होता है वहा हिंसा का पालन होता ‎है शुद्धसागर महाराज

धर्म

जहां-जहां धर्म‎ होता है, वहां अहिंसा का पालन‎ होता है और जहां-जहां अधर्म‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ होता है वहा हिंसा का पालन होता‎ है। शुद्धसागर महाराज

रावतभाटा

नयाबाजार पार्श्वनाथ ‎ ‎ दिगंबर जैन मंदिर में वर्षायोग कर‎ रहे श्रमण मुनि श्री  शुद्धसागर महाराज‎ ने कहा कि है जीव हमारी सोच, ‎ ‎ विचार, मान्यता सभी समिचित हैं। ‎ ‎ जिसे हमने दूसरों से उधार लिया‎ है और हम वहीं कर रहे हैं। मनुष्य‎ की ऐसी कई धारणाएं हैं, जो कि ‎ ‎ तीर्थंकर की देशना अर्थात्‎ जिनवाणी से बिल्कुल अलग होती‎ हैं। ऐसे विचार जो जिनवाणी से ‎ ‎ बिल्कुल ही नहीं मिलते हों, उससे ‎ ‎ हमारा कल्याण बिल्कुल ही संभव‎ नहीं है।‎ मुनि ने कहा कि है जीव जिस ‎ ‎ प्रकार कुंए का पानी शुद्ध होता है, ‎ ‎ साथ ही उसमें अनेक गुण पाए‎ जाते हैं। यदि उसमें थोड़ा सा विष‎ डाल दिया जाए, तो उस पानी के‎ सारे गुण समाप्त हो जाते हैं। उसी‎ प्रकार जीव धर्म को जानता नहीं है‎ फिर भी वह तन-मन-धन से धर्म‎ के प्रति समर्पित है तो वह धर्म को‎ जाने बिना तो अपनी अहिंसा से‎ धर्म के विपरित ही कार्य करता है।‎ उन्होंने कहा कि जहां-जहां धर्म‎ होता है, वहां अहिंसा का पालन‎ होता है और जहां-जहां अधर्म‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ होता है वहा हिंसा का पालन होता‎ है। वहीं जैनियों के लक्षण बताते‎ हुए मुनि ने कहा कि जैनी व्यक्ति‎ कभी भी बिना छना जल नहीं‎ पीता है। क्यूकि ग्रन्थों और‎ वैज्ञानिक दोनों तरीके से यह‎ प्रमाणित हो चुका है कि पानी की‎ एक बूंद में असंख्यात जीव होते‎ हैं। हमारे मन में सभी जीवों के‎ प्रति दया, अहिंसा की भावना होनी‎ चाहिए। हर कार्य को करते समय‎ अपने भावों को शुद्ध रखना‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ चाहिए। सभी का हित सोचना‎ चाहिए। जिनवाणी जो है,वो‎ भगवान को सुनाने के लिए नहीं‎ है,बल्कि वो तो बनने वाले‎ भगवान के लिए होती है। अपने‎ जीवन में भगवान की वाणी‎ अर्थात जिनवाणी को सुनने मात्र‎ से कुछ नहीं होगा,हमें उसे सुनकर‎ अपने आचरण में लाने की‎ आवश्यकता है।‎ जिनवाणी भगवन को सुनाने के‎ लिए नहीं है,बल्कि वो तो निज की‎ आत्मा के लिए कल्याणकारी है।‎ जिस प्रकार कुम्हार गिली मिट्टी से‎ घड़े का निर्माण करता है,उसी‎ प्रकार से व्यक्ति के जीवन में वह‎ गुरु के उपदेश से अपने जीवन में‎ कल्याण कर सकता है। यदि हम‎ दूसरों को देखकर के धर्म करते है‎ तो ना तो हमारा धर्म बचता है ना‎ ही धर्म करने वाला।‎ इस प्रकार मुनि कहते है कि हमें‎ अपने भावों को शुद्ध रखना‎ चाहिए। तीर्थंकर की देशना अर्थात्‎ जिनवाणी सुनकर दूसरों का नहीं‎ बल्कि निज (स्वयं) का कल्याण‎ करना चाहिए। धर्म की जड़ ही‎ दया भावना होती है, अर्थात् हमें‎ जीवन में दया भावना रखते हुए‎ सबके हित में है सोचना चाहिए।‎ जिनवाणी सुनकर निज को‎ कल्याण में लगाना संसार का‎ सबसे बड़ा धर्म है। जिनवाणी‎ सुनकर दूसरों को देखना सबसे‎ बड़ा अधर्म है। मुनि ने बताया कि‎ महावीर की अहिंसा अत्यंत सूक्ष्म‎ है, उसे इतनी आसानी से पालन‎ नहीं किया जा सकता है। इस धर्म‎ सभा में समाज के पुरुष, महिला,‎ बालक, बालिकाएं मौजूद थे।‎

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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