जन्म लिया तो मृत्यु निश्चित बचा नही सकता तंत्र मंत्र निरामय सागर महाराज
गुना
जीवन और मृत्यु का अटल सत्य कोई भी नहीं बदल सकता। चाहे वह राजा हो, देवता हो या चक्रवर्ती सम्राट-जिसने जन्म लिया है, उसे मृत्यु को भी स्वीकारना होगा। यह गूढ़ जीवन संदेश चौधरी स्थित महावीर भवन में चातुर्मासरत मुनिश्री 108 योगसागर महाराज के ससंघ मुनिश्री 108निरामय सागर महाराज ने ‘कार्तिकअनुप्रेक्षा महाग्रंथ ‘के स्वाध्याय के दौरान दिया।
मुनिश्री नेकहा कि इंद्रों की आयु भले सागर जितनी दीर्घ हो, लेकिन अंततः वे भी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। मुनिश्री ने धर्म की महत्ता को बताते हुए कहा कि जब संसार के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं, तब धर्मी एकमात्र शरण बनता है। दुख औरसंकट के समय में ही हमारी असली परीक्षा होती है कि हम किस दिशा में जाते हैं सच्चे देव, शास्त्र और गुरु की ओर या भटकते हुए कुदेव कुगुरु की ओर उन्होंने कहा कि धर्म ही वह शरण है जो व्यक्ति को संसार के भ्रम से निकालकर सम्यक दर्शन की ओर ले जाती है। उन्होंने अरहंत, सिद्ध, साधु और जिन धर्म को चार वास्तविक शरण बताया और कहा कि जब तक हम जमीन से जुड़े रहेंगे, तभी हमें सफलता और जीवन का सार मिलेगा। सांसें सीमित हैं और हर क्षण आयु कमहो रही है। अतः समय का सदुपयोग करके धर्म में स्थिरता लानी चाहिए।संकट में सब दरवाजे बंद हों, धर्म साथ देता है।
मुनिश्री निरामय सागर ने प्रवचन में कहा कि संसार में जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब केवल धर्म ही ऐसा मार्ग है जो उजाले की ओर लेजाता है। संकट के समय कई लोग भ्रमित होकर कुदेव, जिन धर्म और तंत्र-मंत्र की ओर चले जाते हैं और अपना रोग और बढ़ा लेते हैं।.जबकि सच्चा मार्ग अरहंत, सिद्ध, साधु और जिन धर्म की शरण है। धर्म ही एकमात्र सच्ची और सुरक्षित शरण है जो हमें भ्रम से निकालकर की दिशा में ले जाती है।

मुनिश्री ने एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक श्रावक, जिसे चौथी स्टेज का कैंसर था, डॉक्टरों ने जीवन की सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं। वह आचार्य श्री के दर्शन को गया और वहां से रात्रि भोजन और चार प्रकार के आहार का त्याग कर लौटा। उसकी श्रद्धा, विश्वास और आत्मसमर्पण केबल से उसका कैंसर धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


