लक्ष्य तक पहुंचने के लिए गुरु का सानिध्य और गुरु के उपदेश के साथ साथ स्वयं का पुरुषार्थ होना भी जरूरी है समता सागर महाराज

धर्म

लक्ष्य तक पहुंचने के लिए गुरु का सानिध्य और गुरु के उपदेश के साथ साथ स्वयं का पुरुषार्थ होना भी जरूरी है समता सागर महाराज
पारसनाथ
लक्ष्य तक पहुंचने के लिये “गुरु” का सानिध्य और गुरु के उपदेश के साथ साथ स्वयं का पुरुषार्थ और भाग्य होंना भी जरूरी है” उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने पावनधाम गुणायतन श्री सम्मैदशिखर जी में 1008 भगवान श्री पारसनाथ की विशाल प्रतिमा को विराजमान करते समय प्रातःकालीन धर्म सभा में व्यक्त किये।

 

 

मुनि श्री ने कहा कि “गुरु” बोल करके भी उपदेश देते है, गुरु मौन रहकर के भी उपदेश देते है, गुरु की मुद्रा,गुरु की चर्या उनका उठना बैठना भी अपने आप में उपदेश हुआ करता है

उन्होंने अमरकंटक में आचार्य गुरुदेव की चर्या का उदाहरण देते हुये कहा कि समाज के श्रैष्ठी वर्ग आचार्य श्री के कक्ष में समय के पहले पूजन करने पहुंच गये आचार्य श्री ने एक नजर देखा और घड़ी की ओर इशारा किया तो सभी समझ गये और कक्ष से बाहर निकल गये। मुनि श्री ने कहा कि आचार्य श्री की दिनचर्या समयबद्ध होती थी, यदि आपने समय का उलंघन किया तो उन्होंने बिना बोले ही उपदेश दे दिया उन्होंने कहा कि अनुशासन की परिभाषा ग्रंथों में समझ में आये अथवा न आये लेकिन गुरुवर ने ” प्रशासनिक सेवाओं में समाज के युवक युवतियों को आगे बढ़ाने के लिये “अनुशासन” के साथ आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया और देश भर की प्रतिभायें गुरु के मार्गदर्शन में आगे बढ़े।

उन्होंने कहा देश और दुनिया में शिक्षा तो बहुत बड़ी मिल रही है लेकिन शिक्षा के साथ साथ संस्कार और सदाचार “प्रतिभास्थली” के माध्यम से बालिकाओं को मिल रही है ऐसा अन्यत्र कही ओर देखने को नहीं मिलता यह आचार्य श्री की दूरदृष्टि और परिकल्पना थी कि यदि संस्कृति को शाकाहार तथा सदाचार से सुरक्षित रखना है,शिक्षिकाओं में सदाचार और संस्कार जरुरी है उन्होंने प्रतिभास्थली एवं हथकरघा में लगे सभी ब्रह्मचारी बहनों को आशीर्वाद देते हुये कहा कि उच्च शिक्षा प्राप्त सभी बहनें पूर्ण समर्पण के साथ इस कार्य में लगी हुई है तथा हथकरघा” में लग कर अहिंसात्मक वस्त्रों के निर्माण में दूसरों को भी आजीविका का साधन उपलव्ध करा रही है।तथा अहिंसाधर्म का प्रचार प्रसार कर गुरुदेव के उद्देश्यों को आगे बढ़ा रही है।

साधना की कीमत है साधनों की नहीं गुरुमति माताजी
इस अवसर पर मुनि श्री पवित्र सागर,मुनि श्री अतुल सागर मुनि श्री आदिसागर महाराज विराजमान थे तो दूसरी और से आचार्य गुरुदेव विद्यासागर महाराज से प्रथम दीक्षा प्राप्त आर्यिका गुरुमति माताजी ने कहा कि “साधना की कींमत है साधनों की कोई कींमत नहीं।
कुंडलपुर से भोपाल चातुर्मास और वहा से गुरुदेव की अंतिम साधना स्थली चंद्रगिरी पर पहुंचे आचार्य श्री का आशीर्वाद था और उन्हीं की आज्ञा से जहा हमारे पास एक कदम उठाने की भी सामर्थ नहीं थी वहा पर न जाने कितने कदम उठ गये और हम भगवान पारसनाथ की शरण में आ गये ।

उन्होंने कहा कि 42 वर्ष पूर्व ब्रह्मचारी अवस्था में आचार्य श्री के साथ बंदना की थी उन्होंने कहा कि “गुणायतन” में बहूत अच्छा लग रहा है यह शाश्वत सिद्ध भूमी है “यहा साधना की कींमत है साधनों की कोई कींमत नहीं”जिस उद्देश्य को लेकर के सिद्ध भूमी पर आये है उन भावों के साथ सिद्धक्षेत्र की वंदना करना चाहिये ऊपर पर्वत पर लिखा था कि धीरे धीरे भावों के साथ वंदना करो पूर्ण होगी और धीरे धीरे चलकर आये है और धीरे धीरे ही सही वंदना पूर्ण हो रही है यहा पर आकर विषयों की ओर तो दृष्टि जाना ही नहीं नहीं चाहिये।

 

इस अवसर पर आर्यिकारत्न दृढ़मति माताजी सहित संघस्थ सभी 45 आर्यिका मंचासीन थी। मंच पर ऐलक श्री निश्चय सागर ऐलक निजानंद सागर क्षु. संयम सागर विराजमान थे।
कार्यक्रम का संचालन प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्र. अशोक भैया कर रहे थे।

 

मुनिसंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी तथा गुणायतन के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी वीरेंद्र जैन छाबड़ा ने बताया प्रातःकाल मंत्रोच्चारण के साथ सभी मांगलिक क्रियाओं के साथ मूलनायक भगवान श्री पारसनाथ को नव निर्मित वेदी पर विराजमान किया गया तथा सभी मुख्यपात्रों ने अभिषेक तथा मुनि श्री के मुखारविंद से शांतिधारा संपन्न हुई।इस अवसर पर बड़ी संख्या में स्थानीय समाज तथा उनके पदाधिकारियों ने तथा गुणायतन परिवार के सदस्यों ने भाग लिया
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *