–आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के 55 वे दीक्षा दिवस पर भाव भीनी अभिव्यक्ति
-आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज जो विद्याधर से मुनि विद्यासागर बने 55वर्ष हो गए। कक्षा 9वीं तक अपनी लौकिक शिक्षा को पूर्ण कर आप सन 1966 में आपने संसार के मोह माया बंधन से परे उठकरआचार्य देशभूषण जी महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत को अंगीकार किया आषाढ़ सुदी पंचमी 30 जून 1968 को अजमेर राजस्थान सोनी जी की नसिया में आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ने मुनि दीक्षा देकर मोक्ष के पद की और अग्रसर किया

पूज्य गुरुदेव का ज्ञान तप त्याग संयम सेवा इतनी गहन थी की मात्र 26 वर्ष की अल्पआयु में पूज्य आचार्य ज्ञानसागर गुरुदेव ने 22 नवंबर 1972 को अपना आचार्य पद सौंप दिया। पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित 100 से अधिक ग्रंथ, काव्य प्रकाशित हो चुके हैं। जो जन जन के कल्याण का मार्ग उन्नत कर रहे हैं।
आषाढ़ सुदी पंचमी 30 जून 1968 को अजमेर की सोनीजी की नसिया में छोटी सी उम्र में युवा सोम्य छवि विद्याधर की जब मुनि दीक्षा होने लगी तबं वहा भक्तो का हजूम ही हजूम दिखाई पड़ता था जब विद्यासागर ने स्वयं अपने हाथो से केशो का लुंचन किया था बहुत ही कम लोग होगे जिनकी पलके न भीगी हो जेसे ही दीक्षा हुयी वहा झर झर बर्षा होने लगी मानो लगा इंद्र देव भी इसकी सहमती दे रहे हो पूज्य गुरुदेव आचार्य ज्ञानसागर गुरुदेव ने दीक्षा के संस्कार कर नया नामकरण करते हुए मुनि श्री 108 विद्यासागर जी महाराज नाम दिया

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज महामना है
आचार्य गुरुदेव विद्यासागर जी महाराज के लिये कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है वे इस धरा पर साक्षात भगवान है पूज्य गुरुदेव मे स्व और पर कल्याण की भावना निहित है। गुरुदेव ने हथकरधा केंद्र, प्रतिभास्थली, पूर्णायु, गोशाला आदि के प्रेरक बन गुरुदेव मानव जाति का कल्याण किया ।
इस युग में गुरुवर जन्मे में यह इस युग का सौभाग्य रहा
गुरुवर के युग में हम जन्मे यह हम सब का सौभाग्य रहा।

संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमंडी
