आज से 26 वर्ष पूर्व हुईं थीं मुनि श्री चंद्रप्रभ सागर महाराज की मुनि दीक्षा

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आज से 26 वर्ष पूर्व हुईं थीं मुनि श्री चंद्रप्रभ सागर महाराज की मुनि दीक्षा

त्याग तपस्या की अद्भुत मूरत निर्मोहीता निष्प्रहता का जीवंत प्रमाण है मुनि श्री 108 चंद्रप्रभ सागर महाराज
सचमुच सत्य एवम यथार्थता लिए हुए हैं हमारे संत जो हे प्रकाश पुंज वीतराग ज्ञान में
इंसानियत जगाई तुमने संविधान में
अवतार महावीर के हो वर्तमान में।

 

 

मुनि श्री 108 चंद्रप्रभ सागर महाराज जैसे संत पंचम युग में मिलना एक तप का जीता जागता प्रमाण है जब से इन्होंने मुनि दीक्षा लिए तब से अब तक एक आहार एक उपवास की साधना कर रहे हैं। इनके तप करते-करते खुद का वंदन हो जाता है
इनके दर्शन इनकी साधना को देख मन हृदय कमल खिल जाता है।

 

ऐसे संत को महामना आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने आज से 26 वर्ष पूर्व मुनि दीक्षा देकर वैराग्य के पद पर अग्रसर किया था। निश्चित रूप से ऐसे संत की आशीष हमें इस काल में प्राप्त हो रही है जो किसी अजूबे से कम नहीं। पूज्य महाराज श्री ज्ञान ध्यान तप में लीन रहते हैं। उनकी साधना का ही परिणाम था कि उनके गुरु की समाधि के समय में सबसे नजदीक और सबसे ज्यादा सानिध्य एवं आशीष का अवसर उन्हें ही प्राप्त हुआ था। रामगंज मंडी नगर उनके आशीष एवं उनके प्रवास उनकी सन्निधि को कभी नहीं भूल पाएगा।

 

महाराज श्री का जन्म 1 जून 1966 को मातोश्री रतन माला एवम पिता धनपाल जैन की बगिया में चिकोड़ी बेलगांव कर्नाटक में हुआ यह वह स्थान है जहां से आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का स्थान बिल्कुल ही नजदीक है। यदि महाराज श्री की शिक्षा पर नजर डाली जाए तो महाराज श्री ने अपना शैक्षणिक अध्ययन एमकॉम एलएलबी कर किया। महाराज श्री ने शैक्षणिक अध्ययन के साथ आध्यात्मिक अध्ययन भी किया एवं संत सेवा में अपना सर्वस्व दिया इसका परिणाम यह हुआ कि महाराज श्री की पढ़ाई पूर्ण हो गई थी और उनका नंबर न्यायाधीश के लिए आ गया लेकिन उनका मन संसार चक्र में नहीं था और तुरंत ही उन्होंने संसार मार्ग से त्याग लेकर वैराग्य की ओर अग्रसर होने के लिए अपने कदम बढ़ा दिए और 13 अक्टूबर 1990 को उन्होंने महामना आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज से महुआ गुजरात में ब्रह्मचर्य व्रत को ग्रहण किया और धर्म ध्यान में रहकर अध्यनरत हो गए एवं साधना के पद पथ पर अग्रसर होते चले गए। आज से ठीक 26 वर्ष पूर्व आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज ने उन्हें मुनि दीक्षा देकर मुनि श्री 108 चंद्रप्रभ सागर नाम किया।

 


महाराज श्री जैसे तपस्वी उत्कृष्ट साधक सचमुच बिरले ही होते है। राग रंग से परे हैं समता रस की फुलवारीहै।
हे मुनिवर धन्य हो तुम कितना परिषह सहते हो
जग से कुछ नहीं कहते हो
त्याग नदी बनकर के सारे विश्व में बहते हो
श्रमण भगवान महावीर की तपस्या को इन्हें देखकर जानी इसके साथ ही हमारे शास्त्रों ग्रंथों की क्षमता क्या है यह हम इनके जीवन से देख सकते हैं। महाराज श्री तो चारित्र के प्रखर सूर्य हैं।
इनके आगे चांद सूर्य की ज्योति भी फीकी सी पड़ती है।
इनके जीवन से यह भी परिलक्षित होता है कि जो कामना की भावना से कोसों दूर है कहीं ना कहीं ऐसे संत भी जरूर हैं।
जो कामना की साधना को निष्काम करें हैं कहीं ना कहीं ऐसे संत भी जरूर हैं।
आज के पावन दीक्षा दिवस पर यही कामना करते हैं की आपका संयम पथ और वृद्धि करे हम सभी को आपका मंगल आशीर्वाद एवं सानिध्य युगों युगों तक मिलता रहे।

नमोस्तु अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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