गणिनी प्रमुख आर्यिका ज्ञानमति माताजी ने किए केशलोच

धर्म

गणिनी प्रमुख आर्यिका ज्ञानमति माताजी ने किए केशलोच
अयोध्या
भगवान ऋषभदेव दिगंबर जैन मंदिर रायगंज अयोध्या में ज्ञान रत्न भंडार गणिनी प्रमुख आर्यिका 105 ज्ञानमति माताजी ने केशलोच किया इसी अनुपम बेला में विश्व शांति की कामना को लेकर सर्वप्रथम भगवान ऋषभदेव की 51फीट उत्तंग प्रतिमा का अभिषेक किया गया।

 

 

 

भाव विहल क्षण थे जब गुरु मां ने अपने केशो को स्वयं अपने हाथों से उखाड़ा
वरिष्ठ साध्वी गणिनी आर्यिका 105 ज्ञानमति माताजी ने जब स्वयं अपने हाथों से अपने केशो को उखाड़ा सभी उनकी साधना को देख भाव विहल हो उठे सभी को देख देखकर अखियों में पानी आ गया स्वयं के हाथों केशो का लोचन एक साधना है एक तपस्या है।

कैशलोच शरीर से निर्ममता का प्रतीक है
दिगम्बर जैन साधु एवं साध्वियों को दीक्षा के पश्चात् अपने हाथों से अपने केशो को निकालना होता है। जिसे शरीर से निर्ममता का प्रतीक समझा जाता है।

जिस दिन जैन साधु अपने हाथों से केशलोचन करते हैं उस दिन निर्जल उपवास करते हैं। वर्तमान में सारे देश के अन्दर 1750 दिगम्बर संत विराजमान हैं जो साल में चार बार इस प्रक्रिया को अपने हाथों से सम्पन्न करते हैं एवं त्याग और संयम की साधना के करते हुए दिन में एक बार ही आहार ग्रहण करते हैं दवाई, पानी आदि उसी समय लेते हैं यदि भोजन में अन्तराय आ जाए तो 24घंटे बाद जल की बूंद ग्रहण करते हैं। पदयात्रा करते हैं किसी भी वाहन का प्रयोग ठंडी,गर्मी बरसात में नहीं करते हैं। जैन साधुओं का ये मुख्य गुण होता है।

 

गणिनी माताजी 73 वर्ष से संयम की आराधना कर रही है
परम पूजनीय गणिनी आर्यिका 105 ज्ञानमति माताजी 73वर्ष से संयम तप आराधना सेकर रही हैं । त्याग की प्रतिमूर्ति महासाधिका विदुषी माताजी ने 550 से अधिक ग्रंथों का सर्जन अपनी लेखनी से किया है।

रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने बताया कि प्रत्येक जैन साधु को यह प्रक्रिया करना अनिवार्य है। सबसे पहले केशलोंच करना होता है उसके पश्चात् ही उनके मस्तक पर संस्कार गुरु के द्वारा किए जाते हैं। जिससेवह दीक्षा ग्रहण करते हैं। यह अपने आप में कठोर तपश्चरण है, क्योंकि वर्तमान युग में केश ही आकर्षण है लेकिन जैन संत घास के समान इसको अपने हाथों से निकालते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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