जहां विषय भोगों का माहौल हो वहां धर्म नहीं हो पाता,अजित सागर महाराज
दमोह
विश्व वन्दनीय आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनि श्री अजित सागर महाराज ने अपने उद्बोधन मे जिनवाणी आराधना व प्रभु भक्ति पर प्रकाश डाला उन्होने कहा प्रभु आराधना एवं जिनवाणी की उपासना से अशुभ कर्म टल जाते हैं, साथ ही जब भव्य आत्माएं जब प्रभु भक्ति में लगती हैं तो वे अशुभ प्रवृत्ति से दूर होकर शुभ प्रवृत्ति में लग जाती हैं। यह सब धर्म के क्षेत्र में होता है। महानगरों में यह संयोग संभव नहीं है।
विदेशों में लोग धन अर्जन में लगे रहते हैं, उन्हें धर्म आराधना करने की फुर्सत नहीं होती।
पूज्य मुनि श्री ने धर्म आराधना के विषय मे कहा अष्टानिका पर्व पूरी दुनिया में आते हैं किंतु वे भारत में ही मनाए जाते हैं। विदेशों में लोग धन अर्जन में लगे रहते हैं, उन्हें धर्म आराधना करने की फुर्सत नहीं होती। पर्व ही निमित्त होता है जिसके माध्यम से श्रावक आत्म साधना मे लग जाता है। उन्होने कहा जहा विषय भोग का वातावरण होता है वहा धर्म नहीं होता।
स्वर्ग मे रहकर तप नहीं किया जा सकता
मुनि श्री विषय भोग पर प्रकाश डालते हुए कहा स्वर्ग की भूमि बहुत सुन्दर है किन्तु उपजाऊ नहीं है। वहा रहकर संयम और तप नहीं किया जा सकता। संयम और तप को मनुष्य केवल पृथ्वी लोक पर ही धारण कर सकता है अन्यत्र कही नहीं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
