श्रद्धा की पेंदी बिन स्वस्थ ( स्व में स्थित) रूप नहीं
प.पू. पट्ट गणिनी आर्यिका श्री विज्ञमति माताजी
श्री सम्मेदशिखर, मध्यलोक
त्रिलोक कल्याणी जगत पूज्या भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 विशुद्ध मति माताजी की प्रियाग्र शिष्या पट्ट गणिनी आर्यिका 105 श्री विज्ञमति माताजी ने अपनी पियूष वाणी से भव्यजनों को कृतार्थ करते हुए कहा कि जो आत्मा भटक चुकी है, अटक चुकी है, लेकिन अब अटकना और भटकना नहीं चाहती तो वह अपने आपको ठीक उसी प्रकार परिमार्जित करती है जिस प्रकार किसान बड़े-बड़े, छोटे-छोटे कंकर- पत्थरों को शोध कर बंजर वसुधा को उपजाऊ बनाता है।
इस तरह अनादि कालीन भ्रमणशील आत्मा भी जब गुरु के दर्शनों का सुलाभ प्राप्त करता है तो वह भी अपने बंजर आत्म क्षेत्र को श्रद्धा के जल से सींचकर उपजाऊ बनाने का एक प्रयास करता है। पूज्या माताजी ने कहा कि पुरुषार्थ करना मनुष्य का कर्तव्य है, फिर भी सफलता नहीं मिली तो हारना नहीं हैं। दुकान पर ग्राहक नहीं आते तो क्या दुकान बंद कर दी जाती है ?? नहीं ना। ठीक इसी प्रकार जिनवाणी का सार समझ नहीं आए तो भी स्वाध्याय कक्ष में अवश्य बैठना चाहिए।
क्योंकि इस मोक्ष मार्ग में, ना जाने, गुरु देशना के कौन से अमृत वचन आपके बंजर आत्म प्रदेशों को उपजाऊ बना सम्यक फलों को प्राप्त करा देंगे क्योंकि मोक्षमार्गी गुरुजन भली भांति ये जानते हैं कि कैसे कड़वी टेबलेट देकर मेरे अबोध शिष्य के मिथ्यातव ज्वर को नष्ट किया जा सकता हैं। क्योंकि सद्गुरु के समझाने पर शिष्य की धारणा बन जाती है और धारणा के द्वारा परिणामों की विशुद्धि हो जाती है और जैन दर्शन कहता है कि जब परिणामों की विशुद्धी बढ़ती है तो अवर्णवाद के फलस्वरुप जिस शिष्य ने 70 कोड़ा कोड़ी सागर की स्थिति का बंध किया था, वह भी अपनी कषायों को कृष करता हुआ, शुभ में प्रवृत्ति करता हुआ उस स्थिति को, मात्र अंत कोड़ा कोड़ी सागर तक ले आता है।

इसीलिए आचार्य भगवंत ने कहा है कि अपने आत्म प्रदेशों में भारी श्रद्धा की पेंदी लगा ले। श्रद्धा रूपी पेंदी लगा लेगा तो तू स्थिर होकर स्वस्थ रूप (स्व- स्थ/ स्व में स्थित) को प्राप्त कर लेगा। अन्यथा लुढ़क जाएगा और संसार से कभी पार नहीं हो पाएगा।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट
