आदत थी हमें रिश्तों में, दुध की तरह घुल मिल जाने की.. याद ही नहीं कि जमाना तो शुगर फ्री हो गया है..!अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

आदत थी हमें रिश्तों में, दुध की तरह घुल मिल जाने की.. याद ही नहीं कि जमाना तो शुगर फ्री हो गया है..!अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज
कुलचाराम हैदराबाद
अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा किआदत थी हमें रिश्तों में, दुध की तरह घुल मिल जाने की. याद ही नहीं कि जमाना तो शुगर फ्री हो गया है..!

 

इसलिए –सन्त अपने प्रवचनों में सिद्धांत नहीं,‌‌ श्रद्धा देता है। शस्त्र नहीं सत्य देता है।पंथ नहीं पथ देता है। ज्ञान नहीं अनुभव देता है।

उन्होंने कहा तभी तो यह चलते फिरते संत अरिहंत जीवन में अनुभव बटोरते हैं, और अमृत बाँटते हैं। संत की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि सन्त इस देश की जीवन्त प्राण प्रतिष्ठेय होते हैं। एक उदाहरण के माध्यम से समझाया कि किसी ने पूछा -आदमी और कुत्ता में क्या अन्तर है?* हमने कहा — कुत्ता हमेशा, अनजान को देखकर भौंकता है। लेकिन आदमी जब भी भौंकता है तो जाने पहचाने को देखकर, भौंकता है।* कुत्ते को कोई अपरिचित मिल जाए तो वह जरूर भौंकता है। लेकिन आदमी की स्थिति इससे विपरीत है। वह हमेशा अपनों को देखकर ईर्ष्या करेगा, जलेगा। कोई किसी का खास हो जाये तो सहन नहीं कर पायेगा, अपनों के मान सम्मान कीर्ति में भीतर ही भीतर खाक हो जायेगा, और अपनों को देखकर भौंकता है।

 

 

उन्होंने कहा यदि किसी को अपना बनाना है तो सबसे प्रेम करो। सबकी सेवा करो, और सब में प्रभु के दर्शन करो। धर्म का मूल उद्देश्य और सन्देश भी यही है। दुश्मन को अपना बनाना है तो उसकी पीठ पीछे खूब प्रशन्सा करो। जब वो दूसरे के मुख से अपनी प्रशन्सा सुने तो पानी पानी हो जाये। उन्होंने कहा वही इंसान आज समझदार है, जो दुश्मनों में भी दोस्ती का हाथ बढ़ा दे…!!!।

नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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