प्रत्येक चमकने वाली वस्तु सोना नही होती विहर्ष सागर महाराज

धर्म

प्रत्येक चमकने वाली वस्तु सोना नही होती विहर्ष सागर महाराज
विदिशा
एक बच्चा कोचिंग पढ़कर I.A.S.बनता है, कही बच्चे ऐसे होते है जो बिना कोचिंग के ही I.A.S बन जाते है,एक सब्जी बेचने वाले की तीन की तीन लड़कियां सब्जी बेचते बेचते I.A.S बनी और जब वह आशीर्वाद लेंने आई तब हमें मालुम पड़ा “लोग बाहर बाहर ज्यादा घूमते है,और बाहर की चमक को देखकर जल्दी प्रभावित हो जाते है।
प्रत्येक चमकने ली वस्तु सोना नहीं होती, इसलिये कोई आपको चमत्कार दिखाने आ जाए तो उससे प्रभावित होकर अपनी अपनी श्रद्धा को समर्पित मत कर दैना। उससे समलकर कर चलना।


उपरोक्त उदगार आचार्य विहर्ष सागर महाराज ने अरिहंत विहार दि. जैन मंदिर मेंप्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।आचार्य श्री ने 12 प्रकार के तप पर व्याख्यान करते हुये कहा कि एक श्रमण को श्रंगार आदि से रक्षा करते हुये आत्मा की रक्षा करने के लिये 6 प्रकार के अंतरंग और 6 प्रकार बाहरी तप दिये है उन्हें तप की साधना करना चाहिये। भव्य जीव शांत रहकर शांति के साथ साधना करता है,भगवान महावीर कहते है कि बाहर के तप दिखते है,और उन तपों पर आपको घमंड हो सकता है, लेकिन जो अन्तरंग से तप जाता है वह कभी किसी बात पर घमंड नहीं करता। पूज्य श्री ने कहा साधना एक ऐसा मार्ग है जिसे छुपाकर किया जाता है उन्होंने कहा कि महात्मा बुद्ध से पहले भगवान महावीर को केवल्य ज्ञान हो गया महात्मा बुद्ध जो कि उसी जंगल में तपस्या कर रहे थे उन्होंने देखा कि यह कौनसा जीव है जो मुझसे पहले कैवल्यज्ञान प्राप्त कर गया क्योंकि उनकी तपस्या में कमी नहीं थी,एक चावल का दाना लेकर वह महिनों तक साधना करते थे,

आचार्य श्री ने कहा कि साधना एक ऐसा मार्ग है जिसे छुपाकर किया जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक किसी वस्तु का संपूर्ण ज्ञान न हो तब तक किसी वस्तु को सत्य मत कह दैना। उन्होंने राजा बसु का उदाहरण देते हुये कहा कि पर्वत,नारद और बसु एक ही गुरु से पड़े थे पर्वत गुरु पुत्र था और एक बार अज की व्याख्या करते हुये उसका अर्थ बकरा निकल गया उसी सभा में नारद जी भी थे उन्होंने कहा कि अज का अर्थ धान्य से है न कि बकरा से जब गुरु पुत्र पर्वत को ज्ञान हुआ कि उसने गलत अर्थ बता दिया है तो उस बात को सही सिद्ध करने के लिये उसने अपनी मां को राजा बसु के पास भेजा कि आपको नारद की बात को झूठा कहते हुये मेरे पुत्र की बात का समर्थन करना है।

 

 

 

 

 

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि कभी कभी सत्य को जानते हुये भी जब असत्य का समर्थन करते है तो उसके परिणाम भी भयंकर होते है। और उन परिणामों को इसी जीव को भोगना पड़ते है तीनों एक ही गुरु के शिष्य थे और जब राजा बसु ने नारद की बात को काटते हुये असत्य का समर्थन कर दिया तो कहते है कि उनका सिंहासन नीचे रसातल में चला गया।इसीलिये आचार्यों ने कहा है कि कभी किसी को वचन मत देना, देना ही पड़े तो प्रवचन देना वह भी”जिनवाणी” का पूर्ण ज्ञान करके यह जिनवाणी मां हमारे दुःखों को दूर करने की परम औषधि है। जैसे औषधि को उचित अनुपान प्रयोग और पथ्य से दिया जाए तो वह लाभ करती है।
उन्होंने कहा कि पुराने जमाने में तो औषधि रोग को मिटाने के लिये ली जाती थी लेकिन वर्तमान में तो घर घर में ही मेडिकल स्टोर खुले हुये है आजकल घर से निकलते है तो वह मेडिकल स्टोर भी साथ में चलता है।
आचार्य श्री ने ज्ञान की चर्चा करते हुये कहा कि व्यक्ती महान ज्ञान से नहीं बल्कि परिणामों को निर्मल होता है। उन्होंने कहा कि खाना पीना छोड़ने का नाम मोक्ष नहीं,भोजन को इसलिये छोड़ा जाता है जिससे आपको प्रमाद न हो।
उन्होंने कहा कि जिनके जोड़ों में दर्द होता है उनको खटाई छोड़ने को इसलिये कहा जाता है। आचार्य श्री ने कहा कि भेंस का आलस प्रदान करता है,वंही गाय का दूध सुपाच्य और आलस प्रदान नहीं करता उदाहरण देते हुऐ कहा कि गाय जब खेत में चरने जाती है तो ऊपर ऊपर से घास को चरती है जबकि भेंस जड़ सहित उखाड़ती है। उन्होंने कहा जो साधक सजग होता है वही मोक्षमार्गी है। बाहर से कपड़े उतारने का नाम मोक्ष नहीं है भीतर से अपने भावों को सम्हालने का नाम मोक्षमार्ग है।

 

उपरोक्त जानकारी देते हुये अविनाश जैन ने बताया कि आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज का मंगल विहार भोपाल रोड़ पर सूखी सिवनियां के लिये हो चुका है आगामी पांच मई से ग्यारह मई तक पंचकल्याणक है, उनके साथ मुनि श्री संकल्प सागर जी एवं मुनि श्री सदभाव सागर जी महाराज का विहार भी विदिशा से हो चुका है।आचार्य विहर्ष सागर जी महाराज ससंघ अरिहंत विहार जैन मंदिर में विराजमान है प्रतिदिन 8:30 से उनके मंगल प्रवचन हो रहे है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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