*इज्जत इन्सान की नहीं, उसके गुणों की या.मन की उदारता की होती है..!*अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज
कुलचाराम हैदराबाद
अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा किइज्जत इन्सान की नहीं, उसके गुणों की या मन की उदारता की होती है..!
उन्होंने इसको समझते हुए कहा कि मन की उदारता – मन की निर्लोभता या मन की निर्भयता से आती है। मनुष्य जीवन का सबसे अच्छा और सबसे बड़ा गुण है –
उदारता और निर्लोभता को समझाते हुए कहा कि उदारता और निर्लोभता। मन का लोभ या मन का भय, आदमी को उदारता और निर्भयता से वंचित कर देता है। दया करूणा सेवा से जुड़ा हुआ गुण है। उदार व्यक्ति ही मुक्त हस्त से दान, सेवा, परोपकार कर सकता है।
उन्होंने दान की महिमा को को बताते हुए कहा कि देने वाला सबसे बड़ा होता है और लेने वाला छोटा होता है फिर वो राजा हो य अमीर, सन्त हो य फकीर। इसलिए परमात्मा सबसे बड़ा है क्योंकि वो अहर्निश देता है* वह भक्त से कभी कुछ नहीं मांगता। जो मांगता है वह भिखारी है, न सम्राट, न ही परमात्मा। मन या तो उदार हो सकता है या कृपण-कन्जूस। सिर्फ और सिर्फ ज़िन्दगी भर जोड़ना और यूं ही छोड़कर मर जाना।
महाराज श्री ने कहा कि उदारता में – प्रेम, भक्ति सेवा समर्पण सब कुछ है। या यूं कहें कि उदारता ही प्रेम का दूसरा नाम है या प्रेम की परिभाषा। प्रेम में देना ही देना होता है, लेना – रखना – जोड़ना नहीं। लेन-देन तो व्यापार का स्वरूप है – प्रेम व्यापार कैसे हो सकता है-? प्रेम और उदारता मन की विशालता से संचालित होती है। उदारता और निर्भयता मन की शान्ति और चेहरे की प्रसन्नता में कारण बन जाती है। भय और लोभ के कारण व्यक्ति कृपण हो जाता है, इसमें जोड़ने का भाव और भय में जैसे – मृत्यु का भय, रोग का भय, जोब छूटने का भय, व्यापार में नुकसान होने का भय, बदनामी का भय, और ना जाने कितने भय मन में लेकर आदमी ज़िन्दगी जी रहा है।


आज के आदमी की दशा बताते हुए महाराज श्री ने कहा कि आज के आदमी के दुःख का मूल कारण सिर्फ और सिर्फ यही है, जो उसके पास है वह कम है। यह अभाव ना जीने दे रहा है ना मरने। इसलिए -उदारमना और विशालमना हो कर जीओ..मरने से पहले एक ऐसा गुण पैदा करो जो तुम्हें अमर कर दे…!!!। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्तजानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
