तुमने यदि जोड़ा है तो छोड़ना भी सीखो”प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
स्वांस लेंना जितना जरुरी है, स्वांस छोड़ना भी उतना ही जरूरी है? शरीर के लिये भोजन करना जितना आवश्यक है,मल विसर्जन करना भी उतना आवश्यक है। इस बात से प्रकृति यह संदेश दे रही है कि तुमने यदि जोड़ा है तो छोड़ना भी सीखो” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने दशलक्षण धर्म के आठवें दिवस “उत्तम त्याग धर्म” पर उपदेश देते हुये व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि सभी को एक दिन इस जीवन को छोडकर जाना है जब छोडना ही है तो आनंद के साथ छोड़ो उन्होंने कहा कि किसी को जब आप अच्छे कार्य में मदद करते है तो आपको कितनी खुशी मिलती है और यदि कही दस रुपया भी गिर जाए तो उसको खोजने की कोशिश करते हो मन बड़ा बैचेन हो उठता है। जब चीजें हमारे हाथ से छूटती है तो बड़ी तकलीफ होती है और जब हम चीजों को छोड़ते है तो आनंद से भर जाते है आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज छोड़ने और छूटने का अच्छा अंतर बताते हुये कहते है कि छोड़ने और छुड़ाने में उतना ही अंतर है जितना शौच करने में तथा उल्टी करने में होता है,अर्थात मल विसर्जन करने के बाद आप फ्रेस महसूस करते है क्योंकि छोड़कर आये और उल्टी हो जाये तो जी मचलता है। संत कहते है कि एक दिन तो सभी को छोड़कर जाना है। उन्होंने कहा जीवन यापन करने के लिये नहीं कमाते बल्कि कमाना ही आपका जीवन बन गया है ।जीवन यापन के लिये इतनी ज्यादा कमाई की जरूरत नहीं सारा जीवन जोड़ने में लगता है और ज्यादा जोड़कर छोड़कर कर जाओगे तो तुम्हारे बच्चे आपस में ही लड़ेगे।
मुनि श्री ने एक कंजूस व्यक्ति का उदाहरण देते हुये कहा कि उसके पास गौशाला के दान के लिये कमेटी के लोग पहुचे और उन्होंने सेठजी से कहा कि आप सिर्फ दान की शुरुआत कर दो आपको देना नहीं पड़ेगा आपका नाम लिस्ट में सबसे ऊपर पांच लाख लिखा है उनका नाम सबसे ऊपर लिखा देखा तो सभी को आश्चर्य हुआ और लोगों ने बढ़चढ़कर दान दिया दूसरे दिन कमेटी के लोग सेठजी के पास गये तो सेठ ने उनका सत्कार किया और अंदर गये और पांच लाख का चैक प्रदान किया। मुनि श्री ने कहा कि जो व्यक्ति धन संपत्तियों से ज्यादा आसक्ति रखता है वह एक दिन निश्चित तौर पर सर्प की योनी में जन्म लेता है।एक
पौराणिक कथा सुनाते कहा एक राजा को धन की आवश्यकता पड़ी और राजकोष से जब धन निकालने मंत्री कोषपाल गये तो देखा खजाने पर तो सांप की फुफकार सुन भाग आए ।लेकिन जब राजा खुद गये तो सांप फुफकार छोड़ एक तरफ बैठ गया।राजा को किमिच्छिक दान के लिये खजाने से धन की् आवश्यकता थीअचानक संत का आगमन हुआ राजा ने जब उनसे पूछा तो संत ने कहा कि धन की अधिक आसक्ती ने ही तुम्हारे पिताजी को सांप बना दिया। मुनि श्री ने कहा कि धन कमाओ कमाने के लिये मना नहीं लेकिन उससे व्यामोह मत करो और किसी अच्छे कार्य में लगाते रहोगे तो तुम्हारा मन प्रफुल्लित रहेगा और तुम तुम्हारी संतान पाप के कार्यों से बची रहेगी।







धर्म प्रभावना समिति के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया उत्तम त्याग के दिन श्री सम्मेदशिखर में बन रही आलोकित कृति गुणायतन के लिये कही धर्मालु सज्जनों ने अपने दान की घोषणा कर अपने परिवार को गुणायतन से जोड़ा इस अवसर पर पाठशाला प्रणेता मुनि श्री निर्वेगसागर जी मुनि श्री संधान सागर जी महाराज तथा क्षुल्लक जी मंचासीन रहे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
