20 वर्षों की साधना हुई साकार: गोयल नगर में आचार्य सुनील सागरजी ससंघ का मंगल प्रवेश, भव्य मानस्तम्भ का शिलान्यास, नेमिनाथ मोक्ष कल्याणक श्रद्धा से मनाया गया
आचार्य श्री बोले— मानस्तम्भ अहंकार नहीं, विनम्रता का प्रतीक है; धर्म, ध्यान और आत्मकल्याण को जीवन का लक्ष्य बनाएं
इंदौर, गोयल नगर।
गोयल नगर स्थित श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में उस समय श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का अद्भुत वातावरण बन गया, जब आचार्य श्री 108 सुनील सागरजी महाराज ससंघ का भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर मंदिर परिसर में भव्य मानस्तम्भ का विधिवत शिलान्यास भी संपन्न हुआ। वर्षों से संजोया गया समाज का सपना साकार होने पर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
समाजजनों ने बताया कि लगभग 20 वर्षों से मानस्तम्भ निर्माण की भावना थी, जो गुरुदेव के मंगल पदार्पण एवं मूलनायक भगवान शांतिनाथ की असीम कृपा से अब साकार हो रही है। समाज ने विश्वास व्यक्त किया कि आगामी दीपावली तक यहां भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित होने की प्रबल संभावना है।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने मानस्तम्भ के आध्यात्मिक महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि समवशरण में सबसे ऊंचा स्थान मानस्तम्भ का होता है, जहां तीर्थंकर जिनेश्वर भगवान की प्रतिमाएं विराजमान रहती हैं। उन्होंने कहा कि मानस्तम्भ का वास्तविक संदेश अहंकार का त्याग और विनम्रता का भाव है। इसके दर्शन मात्र से मनुष्य का अभिमान स्वतः समाप्त होने लगता है।
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य को कभी स्वयं को सबसे बड़ा नहीं समझना चाहिए। जैन धर्म, श्रेष्ठ गुरु, जिनालय और मानव जीवन प्राप्त होना अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य है। धन, वैभव, भवन और वाहन तो पुण्य से प्राप्त हो सकते हैं, किंतु सच्चे देव, शास्त्र और गुरु की आराधना का अवसर विरले ही मिलता है। उन्होंने सभी से प्रदर्शन और अहंकार छोड़कर धर्म, ध्यान तथा कर्म निर्जरा के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि मानव शरीर आत्मकल्याण का सर्वोत्तम साधन है, इसलिए इसका प्रत्येक क्षण सदुपयोग होना चाहिए। दिखावे और अहंकार से दूर रहकर सहजता, भेद-विज्ञान और आत्मचिंतन के साथ जीवन जीना ही सच्चा धर्म है।
आचार्य श्री ने विश्वास व्यक्त किया कि गोयल नगर में निर्मित हो रहा यह मानस्तम्भ भविष्य में श्रद्धा, आस्था और धर्म का प्रमुख केंद्र बनेगा। सुंदर पाषाण से निर्मित यह मानस्तम्भ केवल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण नहीं, बल्कि आत्मविनय और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक भी होगा।
इस अवसर पर भगवान नेमिनाथ के मोक्ष कल्याणक का भी श्रद्धापूर्वक आयोजन किया गया। आचार्य श्री ने भगवान नेमिनाथ के त्यागमय जीवन और गिरनार से उनके मोक्ष का स्मरण कराते हुए बताया कि उन्हें स्वयं दो बार गिरनार तीर्थ पर लगभग डेढ़ माह तक प्रवास एवं धर्म प्रभावना का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
गिरनार तीर्थ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान नेमिनाथ के चरणों का महत्व अनादिकाल से रहा है। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि यदि पूर्ण अधिकार देना संभव न हो तो कम से कम श्रद्धालुओं को नियमित दर्शन-वंदन का अधिकार अवश्य मिलना चाहिए। किसी भी अल्पसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाओं की उपेक्षा उचित नहीं है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष भगवान नेमिनाथ के मोक्ष कल्याणक अवसर पर लगभग एक लाख श्रद्धालु गिरनार तीर्थ पहुंचे, जो समाज की अटूट आस्था का सजीव प्रमाण है।
जानकारी स्रोत: माही जैन धीरावत
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

