मानव को अपने स्वभाव में सदैव मृदुता रखनी चाहिए मृदुमति माताजी
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10 लक्षण पर्व के द्वितीय दिवस उत्तममार्दवधर्म पर मंगल प्रवचन देते हुए आर्यिका 105 मृदुमति माताजी ने कहा की धर्म का दूसरा लक्षण है,उत्तममार्दव । मार्दव का अर्थ मृदुताऔर उत्तम का अर्थ श्रेष्ठ अर्थात
जहां श्रेष्ठ है मृदुता वही मार्दव है।
मार्दव धर्म का विरोधी अहंकार,करना व्यर्थ है।अज्ञानी व्यक्ति पर पदार्थों कोअपना मानता है और उसमेंअहंकार करता है, पर घमंड
केपरिणाम में फल क्या होता है ?मुंह के सामने भले ही न कहे,परन्तु परोक्ष में तो कहते ही है कि वह बड़ा घमंडी है।आर्यिका श्री ने कहा कि अहंकार उस अग्नि के समान है बिना ईधन के प्रज्जवलित होती है। यह आत्माके गुणों को जलाकर भस्म कर देती है, विनय से जीवन पवित्र वउन्नशील बनाता है।





जबकि अहंकार से सदा पतन ही होता है।बडी बडी सम्पदाओं के धनी, बड़े राजपाठ के अधिकारी राजा महाराजा भी बडी दुर्दशा के शिकार होते हैं। गर्व करने लायकतो यहां कोई बात ही नहीं है। लौकिक स्थिति की बात, जो आजबडा धनिक है वह कल तुच्छ बन सकता है और जो आज तुच्छ हैवह कल बड़ा बन सकता है,मानव को अपने स्वभाव में सदैव मृदुता रखनी चाहिए।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
