मन में कुछ,वचन में कुछ कहना,ठगना छलने में आनंद मानना मायाचारी है विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने गतियों के विषय में प्रकाश डालते हुए तिर्यंच गति के विषय में प्रकाश डाला उन्होंने कहा कि तिर्यंच गति ऐसी गति है जिसमें कष्ट ही कष्ट और बहुत दुख है। तिर्यंच गति के जीव जंतु देखते हैं तो इस गति के जीव में मात्र दुखों का अंबार है। वास्तविकता में यदि तिर्यंच गति प्राप्त नहीं करना है तो ऐसे ही पुरुषार्थ हमें करने पड़ेंगे। मायाचारी को छोड़ना होगा। माया का फल ही तिर्यंच गति में है।
उन्होंने कहा जब धर्म हृदय में आता है तो हम मायाचारी से दूर हो सकते हैं यदि धर्म हृदय में नहीं आता है तो हम मायाचारी से दूर नहीं हो सकते। यहां का वहां बताया मायाचारी है। आप समझने के बाद भी मायाचारी करते हैं। और उसी में रमे हुए हैं। मन में कुछ क्रिया में कुछ और होता है ठगना ठगने छलना छलने में आनंद मानना,मन में कुछ वचन में कुछ कहना सब मायाचारी म है। कुटिल भाव मायाचारी है, जहा भी आपका भाव टेढ़ा मेडा हुआ तो यह मायाचारी है।

सोच के विषय में कहा की हमारी सोच है कि व्यवहार नहीं बिगड़ना चाहिए लेकिन व्यवहार बिगड़ा तो धर्म बिगड़ा। व्यवहार बनाने में धर्म बिगाड़ा। हम व्यवहार बनाने के चक्कर में कितने धर्म को बिगाड़ रहे हैं। व्यवहार में ही कुटिलता आती हैं इसी व्यवहार के कारण हम तिर्यंच गति का बंध कर लेते हैं।

हम दूसरों को ठगने के लिए योजना बनाते हैं हम मकड़ी की तरह जाल बिछाते हैं और खुद जाल में फंस जाते हैं। एक बार संस्कार पड़ जाते हैं तो उन्हें हटाने के लिए बहुत पसीना आता है प्रयास करना पड़ता है। ठगना मायाचारी है। हम ऐसी मायाचारी कर बैठते हैं जो दूसरों के प्राण भी ले लेती है। रावण का उदाहरण देते हुए कहा कि रावण ने सीता का हरण करने के लिए वेष बदला बाद में जाकर वो लोक में हास का पात्र बन गया।
मायाचारी में कंट्रोल करने का विचार कर ले तो हम कंट्रोल भी कर सकते हैं। यदि कंट्रोल करते हैं तो विशुद्धी बढ़ती है नहीं कर रहे हैं तो विशुद्धी घटती है।
यह हिसाब जरूर लगाना हो क्या रहा है मेरे द्वारा
उन्होंने कहा अपने जीवन का हिसाब जरूर लगाना हो क्या रहा है मेरे द्वारा। जिसको बजट बनाना नहीं आता उसको बजट संभालना भी नहीं आता। हमें आत्म उत्थान के लिए एक-एक क्षण का ध्यान रखना चाहिए। हर क्षण इसके उत्थान के लिए विचार बनाना चाहिए नहीं बनाओगे तो अंत में पश्चाताप होगा। उन्होंने कहा कि जीवन में आगे बढ़ जाओ और कुछ ऐसा काम करो कि मुझे तिर्यंच गति न मिले। स्पष्ट बोलना सीखो आप झूठ बोलते हो बच्चा भी झूठ बोलना सीखता है। बच्चा भी झूठ बोलना और मायाचारी करने लगता है वह स्मोकिंग करके आएगा तो भी नहीं बताएगा। उन्होंने कहा लड़कों के साथ लड़कियों को भी संस्कारित करो। अकेला प्रेम कुछ नहीं करेगा प्रेम के साथ संस्कार भी जरूरी हे। उन्होंने कहा बच्चों को ऐसा सिखाओ की जो लौकिकता के साथ आध्यात्मिकता की भी वृद्धि करें। हमेशा स्पष्ट बोलो आपके अंदर मायाचारी है तो आप स्पष्ट नहीं बोलोगे। अगर नहीं है तो आप स्पष्ट बोलोगे। अपने बेटे बेटियों को अच्छा सिखाओ। जीवन में कोशिश करना तिर्यंच गति के दुखों से बचने की।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
