आत्म ज्ञानी– जो सही, श्रेष्ठ और अच्छा हो, वही चाहेगा। अहंकारी और घमंडी — जो मुझे चाहिए, बस वही श्रेष्ठ है और मंगल भी। अंतरमना आचार्य प्रसन्न सागर महाराज
कुलचाराम हैदराबाद /
*आत्म ज्ञानी* — जो सही, श्रेष्ठ और अच्छा हो, वही चाहेगा।
*अहंकारी और घमंडी* — जो मुझे चाहिए, बस वही श्रेष्ठ है और मंगल भी।

क्रोध, कषाय, द्वेष और ईर्ष्या अज्ञान की परिणिति है, जबकि क्षमा, मौन और मधुर मुस्कान, विवेक, सद्ज्ञान और ध्यान का सु-परिणाम है। *
मौन और सद्ज्ञानी व्यक्ति दूसरे को सुख देकर स्वयं आनंदित होता है। वहीं अज्ञानी व्यक्ति दूसरों को सताकर, पीड़ा देकर उनके मार्ग को अभिरूद्ध कर सुख पाता है।
प्रसन्न सागर महाराज ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि सद्ज्ञान और मौन सदैव सर्जनात्मक और भविष्य लक्ष्मी होते हैं। जबकि क्रोध, कषाय एवं अज्ञान नितांत विध्वंसात्मक होते हैं। *

ज्ञानी और विवेकवान इन्सान स्वयं के साथ-साथ परहित और परमार्थ का कार्य करता है। जबकि अज्ञानी जीव स्वयं के साथ-साथ दूसरे के अनिष्ट हेतु कृत संकल्पित होता है। उसे चाह कर भी पुण्य का कार्य सुलभ नहीं होता है।

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ज्ञान विगत जन्मों की पुण्यों के संचित गुड़ धर्मों का प्रतिफल होता है, वहीं अज्ञान कृत पापों का छल-छलकता समूह। क्रोध के आते ही मनुष्य के जीवन से प्रेम, सुंदर सद्विचार, मधुर ललित अपना एवं आनंद जैसी श्रेष्ठ गुणधर्म सदा-सदा के लिए उसका साथ छोड़ देते हैं। वहीं मौन के वृक्ष पर सुख, शान्ति, समृद्धि एवं आनंद के फल सदा-सदा के लिए उसका फल छोड़ देते हैं,, और क्रोध के वृक्ष पर विनाश एवं पश्चाताप के फल लगते हैं। *
महाराज श्री ने कहा की यह हमें निश्चय करना है कि क्रोध के विध्वंस का मार्ग अपनाना है अथवा सृजन का हमारा यह एक चयन ही हमारे जीवन की दशा और दिशा को बदल देगा…!!!* नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312)
