400 km का पद विहार कर गुरु चरणों में आए आदित्य सागर महाराज गुरु शिष्य का महामिलन रच गया इतिहास
रावतभाटा
शिष्य का गुरु के प्रति कितना अनुराग और कितना विनय भाव होता है यह विगत दो दिनों में संपूर्ण विश्व देख रहा है।
जिसका साक्षी रावतभाटा बन रहा है। यहां एक और साक्षात समोसरण दिख रहा है। वही दो दिनों में गुरु शिष्य का मिलन हुआ है। जो इतिहास के पन्नों पर सदा अमिट रहेगा। कितना अनुपम क्षण था जब गुरुवार का दिन और शिष्य गुरु के चरणों में वह भी गुरुवार के दिन पूज्य मुनि श्री आदित्य सागर महाराज संघ सहित अपने गुरु आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर महाराज की दर्शन एवं आशीष की प्यास के लिए हिम्मतनगर गुजरात से लगभग 400 किलोमीटर का पैदल बिहार कर रावतभाटा पहुंचे। 
जैसे ही पूज्य महाराज श्री आदित्य सागर महाराज रावतभाटा की सीमा पर पहुंचे उनकी अगवानी करने हेतु पूर्व में विराजमान मुनि श्री 108 शुद्ध सागर महाराज पहुंचे। दोनों ने एक दूसरों को नमन किया ऐसा लगा कि दो गुरु भाई आपस में मिल रहे आत्मीयता और वात्सल्यता का प्रतीक यह महा मिलन बन गया एक प्रेरणाप्रद उदाहरण।


उन्हें गाजे बाजे के साथ लाया गया जय-जय कारों का शोर दिख रहा था। बालाराम चौराहे पर जब मुनि श्री आदित्य सागर महाराज पहुंचे और गुरु चरणों को देखा तो वह भाव विभोर हो उठे। इन क्षणों को देख रहे सभी आंखे नम थी। धारा प्रवाह बोलने वाले संत श्री आदित्य सागर महाराज आज गुरु के चरणों में विनम्रता प्रकट कर रहे हैं। उन्होंने गुरु के चरणों को नमन किया और उनके चरणों का प्रक्षालन किया तब जय जयकार होने लगी।

पूज्य मुनि श्री का अपने गुरु के प्रति आत्मीय लगाव और विनय भाव साहब परिलक्षित हो रहा था। उन्होंने गुरु विशुद्ध सागर महाराज के प्रति विनय भाव परिलक्षित करते हुए। सभी को यह प्रेरणा दी की गुरु के समक्ष शिष्य बनकर ही रहना चाहिए। यदि शिष्य अपना शिष्यत्व भूल जाए तो, गुरु भी गुरुत्व भूल जाता है। हम तो आपकी चेतन कृति है। जो कुछ भी आज अच्छा लगता है वह गुरु की वजह लगता है।

महाराज श्री ने जो मार्मिक शब्द गुरु के प्रति प्रकट किए उनको सुनकर हर कोई श्रद्धा भक्ति से भर गया निश्चित रूप से यह महा मिलन यह बताता है कि आज भी गुरुकुल की पद्धति जीवंत है। इतना विनम्र भाव दिख रहा था। महाराज श्री ने कहा गुरु तो आपको जीवन जीने की कला देते है, गुरु आपको अपना नाम देते हैं।
भावुक भरे शब्दों में महाराज श्री से क्षमा मांगते हुए कहा कि वह दिन कभी ना आए, जब हम गुरु चरणों से दूर रहे। गुरु ही होते हैं जो हमारे बुरे दिन बेहतर बनाते हैं। गुरु ही बेहतर दिन को बेहतरीन बनाते हैं। उन्होंने अंत में कहा जीवन में मित्र यही है, सहारा यही है। गुरु का अगर साथ है तो संकट में आपको शंकर जैसा साथ मिलेगा।
कोई शिष्य गुरु चरणों में सर को झुकाता है,
परमात्मा खुद आकर उसे गोदी में बिठाता है। यह महामिलन नैतिकता का पाठ सभी को पढ़ाता है की गुरु के प्रति विनय भाव हमें उन्नति के चरम शिखर पर लाता है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नही है की पूज्य मुनि श्री आदित्य सागर महाराज आदित्य की ज्योति के समान चमकते हुए जैन धर्म को आदित्य की ज्योति के समान महका रहे हैं। मैं तो यही कहूंगा।
गुरु की महिमा वर्णी ना जाए।
गुरु नाम जपो मन वचन काय
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट
