जो शब्द कहे नहीं गये – वो कहीं नहीं गये..अन्तर्मना प्रसन्न सागरजी महाराज
कुलचाराम हैदराबाद
सिर्फ शब्दों से ना करना, किसी के वजूद की पहचान, हर कोई उतना कह नहीं पाता, जितना समझता और महसूस करता है। वैसे भी आज कल लोग, समझते कम — समझाते ज्यादा हैं।* इसलिए रिश्ते सुलझते कम, उलझते ज्यादा हैं। क्योंकि शब्द*रचे जाते, गढ़े जाते, मढ़े जाते, लिखे जाते, पढ़े जाते, बोले जाते, तौले जाते, टटौले और खंगाले जाते हैं।
शब्द बनते हैं, सँवरते हैं, सुधरते हैं, निखरते हैं, हँसते हैं, मनाते हैं, रूलाते हैं, मुस्कुराते हैं, खिलखिलाते हैं, गुदगुदाते हैं, मुखर हो जाते हैं, प्रखर हो जाते हैं और मधुर हो जाते हैं। इतना ही नहीं – शब्द चुभते हैं, बिकते हैं, रूठते हैं, घाव देते हैं, ताव देते हैं, लडते हैं, झगड़ते हैं, बिगड़ते हैं, बिखरते हैं और सिहरते हैं। लेकिन शब्द* मरते नहीं, शब्द थकते नहीं, शब्द रूकते नहीं और शब्द चुकते नहीं।
अपने मंगल प्रवचन में अन्तर्मना प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि इसीलिए
शब्दों से खेले नहीं, बिन सोचे बोले नहीं, शब्द को मान दो, सम्मान दो, ध्यान दो, पहचान दो, उड़ान दो, शब्द को आत्मसात करें, और हर शब्द पर विचार करें।

क्योंकि शब्द अनमोल है, जुबान से निकले बोल है, शब्दों में धार है, शब्दों की मार है और शब्द से उद्धार है। शब्दों का अपना एक संसार है। इसलिए शब्दों में जिम्मेदारी झलकनी चाहिए। क्योंकि आपको बहुत से लोग पढ़ते हैं। हमने अनुभव किया —चेहरे बदल जाये तो तकलीफ होती है..!
लेकिन शब्द और लहजे बदल जाये तो बहुत तकलीफ होती है…!!!। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
