पूज्य मुनिवर सुधासागर महाराज ने अपनी तप साधना से बाहर आकर देश और धर्म के संस्कारों को बचाने के लिये एक गुरुकुल की स्थापना की ,,श्रीश जैन की कलम से

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पूज्य मुनिवर सुधासागर महाराज ने अपनी तप साधना से बाहर आकर देश और धर्म के संस्कारों को बचाने के लिये एक गुरुकुल की स्थापना की ,,श्रीश जैन की कलम से

अंग्रेजो द्वारा भारत के लोगो मे रचे बसे संस्कारों के खात्मे को लेकर जो षड्यंत्र बनाया गया। उसमें भारतीय शिक्षा को पहला निशाना बनाया गया। ताकि संस्कार विहीन शिक्षा के अभाव मे व्यक्ति कुंठा ग्रस्त होकर अपने जीवन को स्वयं भी समाप्त कर ले। और दूसरों का जीवन भी खराब कर दे,,,उनकी बनाई नीति को राजनेताओं ने तो नही समझा। मगर निर्यापक मुनि सुधासागर जी महाराज ने जैसे ही अंग्रेजों की इस नीति को संज्ञान में लिया तुरन्त इसके निसकेन्द्रीयकरण पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया।

 

 

पूज्य मुनिवर ने अपनी तप साधना से बाहर आकर देश और धर्म के संस्कारों को बचाने के लिये एक गुरुकुल की स्थापना की ,, संस्थान की स्थापना राजस्थान की राजधानी जयपुर में हुई और लोगो ने जमकर प्रशंसा करते हुए संस्थान को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने में सहयोग भी किया और सभी के समन्वय का यह परिणाम निकला कि आज यह संस्थान विश्व का एकमात्र संस्कारो सहित शिक्षा प्रदान करने वाला पहला गुरुकुल संस्थान बन गया हैं,,,

ललितपुर के अभिनंदनोदय तीर्थ पर विराजमान पूज्यवर सन्त संस्थान के प्रशिक्षुओं को श्री समयसार जी ग्रन्थ को पढ़ा रहे हैं आज अध्यन के दौरान एक प्रसंग वश उन्होंने सुनाया कि एक व्यक्ति जिसे समयसार पूरा कंठस्थ था और उसे जब भी समयसार पड़ते देखते तो उसके आंनदित चेहरे को देखकर ऐसा लगता था मानो समयसार ही उनका जीवन हैं उन्होंने समयसार को रग रग में बसा रखा हो ,, एक बार उन विद्वान को कंधे के पास एक घाव हो गया देवयोग से जिसमें मवाद भी आ गया उस फोड़े के उपचार हेतु जब डॉ आया तो उसने दबाकर देखा दबाने पर पण्डित जी झल्लाये चिल्लाए और बोले बहुत दर्द है कोई इंजेक्शन लगा लो ,, डॉ भी समयसार समझता था सो बोला पण्डित जी आत्मा और शरीर का आपस मे कोई सम्बन्ध नही आत्मा को कोई फोड़ा होता नही और शरीर हमारा हैं नही तो दर्द का अहसास क्यों ,,, कहते हैं डॉ के इतना कहते ही पण्डित जी जोर से चिल्ला कर बोले भाड़ में गयी आत्मा यहां मेरे प्राण निकल रहे हैं और तुम्हे अभी भी आत्मा की पड़ी हैं,,,

 

अब वही दूसरा प्रसंग श्री गणेश प्रसाद जी वर्णी साहब का सुनाते हुए कहते हैं कि वर्णी जी को भी एक बार बहुत बड़ा फोड़ा हुआ जिसमें बहुत सारी मवाद देख डॉ ने कहा कि इसे बगैर शून्य किये नही निकाल सकते तब श्री वर्णी जी इस बात पर तैयार हुए कि हाथ का ऑपरेशन आप करो और हाथ मे हिलाऊंगा नही बस मुझे पड़ने के लिये समयसार दिया जाए,,, बताते हैं जब वे समयसार पढ़ने लगें तो डॉ ने न सिर्फ ऑपरेशन कर लिया बल्कि टांके लगा कर सिल भी लिया और वे हाथ को सीधा किये ही बैठे रहें
अब यह प्रभाव देखिये किस चीज का था क्या समयसार व्यक्ति के अनुसार फल देता हैं नही बल्कि समयसार तो चैतन्य आत्मा से हमारा साक्षात्कार कराता हैं और उस विद्वान की अपेक्षा चारित्र को अंगीकार करते हुए समयसार मय होने वाले वर्णी जी महाराज जैसे सन्तो पर अपना विशेष आशीर्वाद प्रदान करता हैं इसलिये अब मेरा मानना हैं कि उन समस्त विद्वानों से बचिए जो सिर्फ आत्मा से पहिचान कराने का दावा करते हैं क्योंकि मुसीबत आते ही ये कभी भी आत्मा को भाड़ में झोंक सकते हैं जबकि चारित्र को ग्रहण करने वाला एक क्षुल्लक भी समयसार को अंगीकार कर शुद्धोपयोग में लीन होकर समयसार के सार का चिंतन करते हुए अपना मृत्यु महोत्सव अपने सामने देख कर प्रशन्न हो सकता हैं
पूज्य निर्यापक संत की महती कृपा हैं कि वे आज बहुत ही कम उम्र के बालको को समयसार पड़ा रहें हैं और सिर्फ पड़ा ही नही रहे हैं बल्कि चरित्र अंगीकार करने की प्रेरणा भी दे रहे हैं
पूज्यवर का आशीष हम सभी को सदा मिलता रहे इसी मंगल भावना के साथ

श्रीश ललितपुर से प्राप्त आलेखित
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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