वस्तु स्वरुप को स्वीकार करने का नाम ही सम्यक् ज्ञान है नियमसागर महाराज
विदिशा
वस्तु स्वरुप को स्वीकार करने का नाम ही सम्यक् ज्ञान है यह सम्यक् ज्ञान असत्य को स्वीकार नहीं करता इसलिये सदुपयोग की कोटी में आता है।”
उपरोक्त उदगार संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के परम प्रभावक शिष्य एवं आचार्य श्री समयसागर महाराज के आज्ञानुवर्ती निर्यापक श्रमण मुनि श्री नियमसागर महाराज ने शीतलधाम में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये मुनि श्री ने कहा कि ऐसा जीवन जीना चाहिये जिससे आत्मा का सदुपयोग हो, ज्ञान सम्यक् भी हो सकता है ओर मिथ्या भी हो सकता है जैसे ही आत्मा के अंदर राग द्वेष रुपी परिणाम आते है तुरंत ही आत्मा का दुरुपयोग प्रारंभ हो जाता है और यही मिथ्या ज्ञान है।
शुभ कर्म के उदय से शुभ निमित्त मिलते है और यह आत्मा शुभ की ओर प्रवृति करती है एवं तीव्र पाप कर्म उदय से अशुभ निमित्त मिलने पर यह आत्मा अशुभ की ओर प्रवृति करती है।

मुनि श्री ने कहा कि आप लोग तो चुनाव करके अपना प्रतिनिधि चुनते है लेकिन स्वर्ग में यह व्यवस्था नहीं है वहा तो आपको अपनी उपादान शक्ती को ही लगाना पड़ेगा धर्मात्मा बनकर ही यह जीव स्वर्ग में इंद्र पद को अलंकृत कर सकता है।
श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया यह विदिशा नगर का सौभाग्य है कि परमज्ञानी परम तपस्वी आचार्य गुरुदेव से तीसरे क्रम पर दीक्षा लेंने वाले मुनि श्री जो कि दक्षिण के कोहीनूर कहे जाते है ऐसे निर्यापक श्रमण मुनि श्री नियमसागर जी महाराज ससंघ शीतलधाम पर विराजमान है समाज द्वारा चातुर्मास कलश की स्थापना रविवार दिनांक 4 जुलाई को दौपहर 1:30 बजेशीतलधाम में रखी गयी है।, चातुर्मास आयोजन समिति,श्री सकल दि. जैन समाज, शीतल विहार न्यास ने सभी श्रद्धालुओं से उपरोक्त दिवस पधारने की अपील की है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
