अहिंसा” को शब्दों से नहीं, अहिंसा क्या होती है, यह आचार्य गुरुदेव ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से सिद्ध किया है, गुरुमति माताजी

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज

अहिंसा” को शब्दों से नहीं, अहिंसा क्या होती है, यह आचार्य गुरुदेव ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से सिद्ध किया है, गुरुमति माताजी
विदिशा
अहिंसा” को शब्दों से नहीं, अहिंसा क्या होती है, यह आचार्य गुरुदेव ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से सिद्ध किया है, हथकरघा के माध्यम से शुद्ध वस्त्रों को दिया वही गौशालाओंं के माध्यम से लाखों पशुओं का संवर्धन किया।

 

 

 

उपरोक्त उदगार संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महामुनिराज की प्रथम शिष्या तथा आचार्य समयसागर जी महाराज की आज्ञानुवर्ती आर्यिका गुरुमति माताजी ने अरिहंत विहार जैन मंदिर में व्यक्त किये,उन्होंने कहा कि गौशालाओंं के माध्यम से जहा जीवदया पलती है, वही गाय से शुद्ध दूध और घी हम सभी को प्राप्त हो रहा है।उन्होंने कहा कि रामायण में अपहरण के उपरांत सीता माता के द्वारा पुष्पक विमान से फैके गये आभूषणों को जब लक्ष्मण जी ने देखा तो पैरों की नुपुर और पायल के बारे में तो बता दिया लेकिन जब गले के हार और माथे की बिंदी पर उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि “मेरी दृष्टि कभी पैरों के ऊपर गयी हो तो मेरा जन्म पंचमकाल में हो,

आर्यिकाश्री ने कहा कि हम लोग कुछ ऐसा पुण्य करके आऐ थे कि हमें और आपको आचार्य गुरुदेव जैसा व्यक्तित्व और सानिध्य मिला जिन्होंने षठआवश्यकों का पालन करते हुये 56 वर्ष की साधना में अह़िसा धर्म को साकार कर बता दिया कि पंचमकाल में भी उत्कृष्ट चर्या के धारी मुनि होते है,जिनके बताए मार्ग पर चलकर हम सभी कर्म की निर्जरा कर अपने जीवन को महान बना सकते है।

 

 

 

 

इस अवसर पर आर्यिका रत्न दृणमति माताजी ने कहा कि संत जब समाज के बीच आते है तो धर्म की सुगंधी से सारा बातावरण महक जाता है, उन्होंने कहा 1990 के चातुर्मास के उपरांत जब आचार्य श्री ने विदिशा के लिए संकेत दिया यंहा तो बड़े बड़े विद्वान थे इस अवसर पर पंडित सागरमल जी को याद करते हुये कहा कि हमने सागर में उनसे अध्यन किया था उन्होंने कहा कि सज्जन पुरुष पुष्प के समान होते है, भले ही पुष्प हाथों से निकल जाए लेकिन उनकी सुगंधी हमेशा बनी रहती है, वही दुर्जन पुरुष कोयले के समान होते है,भले ही हाथ से कोयला छूट जाए लेकिन हाथों में कालिख छोड़ जाता है।

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इस अवसर पर नगर गौरव आर्यिका सिद्धमति माताजी ने कहा कि आज से 28 वर्ष पूर्व जब विदिशा में आर्यिका दृणमति माताजी संघ का आगमन हुआ और मेंने उनके वचनों को सुना मन में वैराग्य जागा और गुरुदेव से जाकर व्रत धारण किया गुरुदेव ने मुझे सिद्ध बनने के लिये सिद्धमति नाम प्रदान किया।

प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया आर्यिकासंघ का प्रातःकालीन बेला में मंगल आगमन धर्मनाथ दिगंबर जैन मंदिर बंटीनगर से हुआ आर्यिकासंघ ने जिनालय के दर्शन किये।शोभायात्रा8 बजे से महिला दिव्यघोष के साथ प्रारंभ हुई जिसे विद्यासागर नवयुवक मंडल के युवा संचालित कर रहे थे ओव्हरब्रिज से श्री पारसनाथ दि. जैन मंदिर अरिहंत विहार पहुंची ।

 

 

ज्ञातव्य रहे आर्यिका गुरुमति माताजी का 1995 में तथा आर्यिका दृणमति माताजी 1990-91में आर्यिकासंघ के साथ श्री शांतिनाथ जिनालय में चातुर्मास सपन्न हो चुका है।इसके पश्चात गुरुमति माताजी का अल्प प्रवास 2013 में भी मिला था। सांयकाल आर्यिकासंघ ने अरिहंत विहार से विहार कर शीतलधाम पहुंची एवं समवसरण मंदिर एवं भव्य जिनालय तथा निर्माण कार्यों का अवलोकन किया। रात्री विश्राम शीतलधाम पर रहेगा। चूंकी 2024 का चातुर्मास भोपाल की ओर चल रहा है।17 जुलाई को भोपाल में मंगल प्रवेश है।
संकलित जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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