विरागोदय रूपी जिनशासन का सूर्य हुआ अस्त :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी
जयपुर
परम पूज्य गणिनी आर्यिका 105 विज्ञाश्री माताजी ससंघ सानिध्य में परम पूज्य आचार्य गुरुदेव 108 विराग सागर जी महाराज की सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि समर्पित की गई। आचार्य श्री की समाधि के दुखद समाचार सुनकर आर्यिका संघ सहित जयपुर जैन समाज दुख के सागर में डूब गया। संपूर्ण जगत को सूरज जैसा प्रकाश देने वाले तेजस्वी कुंज आचार्य भगवन गुरुवर विराग सागर जी महाराज आज हमारे बीच से चले गए। महान आचार्य के इस समाधि पर संपूर्ण भारतवर्ष को उनके तप साधना को कोटिश: नमन। आर्यिका संघ के द्वारा समाधि भक्ति एवं 2 मिनट शांतिपूर्ण णमोकार मंत्र का जाप समस्त जैन समाज के बीच कराया गया।
पूज्य माताजी ने गुरु गुणगान करते हुए कहा कि – आज हमारे पास शब्द नहीं है । हमें यह एक स्वप्न सा प्रतीत हो रहा है कि पूज्य गुरुदेव हमारे बीच में नहीं रहे । गुरुदेव उत्कृष्ट साधना के धारक व महान साधक थे । उनकी हर चर्या हम सभी के लिए अत्यंत प्रेरणादायक थी । उनके रोम रोम में वात्सल्य समाया था ।

बच्चे से लेकर वृद्ध तक चाहे वह अमीर हो चाहे गरीब हो सबके प्रति समान व्यवहार पूज्य गुरुदेव किया करते थे । पूज्य गुरुवर ने कितने तीर्थों का निर्माण कराया जिनमें विरागोदय जैसा तीर्थ रूपी कमल पथरिया के पत्थरों में खिल गया । आज पूज्य गुरुदेव हमारे बीच से चले गए लेकिन जैन समाज को 500 से अधिक चैतन्य कृतियां सौंप करके गए हैं । जिनके माध्यम से जिनधर्म की प्रभावना होती रही गई । पूज्य गुरुदेव के आदर्शों , अनुशासन जो उनने हमें दिये है उनको पूरी कर्तव्य निष्ठा के साथ पालन करेंगे ।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
