,”मैं कौन हुं” जब तुम्हें स्वं का बोध हो जाएगा तो तुम स्वंय सिद्ध हो जाओगे- मुनि श्री प्रमाण सागर
जबलपुर “परिस्थितियां हमारे कर्मों के अधीन हैं,लेकिन मनःस्थिति हमारे अपने नियंत्रण में है। अध्यात्म वह शक्ति है जो हर परिस्थिति में मनुष्य को मुस्कुराने की क्षमता देती है
आत्म-बोध और सकारात्मक सोच अपनाने से जीवन का कायाकल्प संभव है”उपरोक्त उदगार गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने “आत्मबोध से आनंद की यात्रा” विषय पर संबोधित करते हुये व्यक्त किये।

मुनि श्री ने कहा कि हर मनुष्य सुख चाहता है,और सुख की तलाश में हम वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, और भाग्य पर केन्द्रित होकर अपने सुख की तलाश करते है,मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया प्रातः8:40 से मुनि श्री के प्रवचन एवं दौपहर 2:45 से शंकासमाधान का कार्यक्रम संपन्न हो रहा है।

मुनि श्री ने कहा कि हमारा पूरा जीवन वस्तुओं के पाने, अथवा वस्तुओं संरक्षित करने में खपा देते है,इसके उपरांत भी सुख हमारे हाथ नहीं आता उन्होंने उदाहरण देते हुये पूछा बताओ आज से बीस साल पहले जितनी वस्तुएं तुम्हारे पास नहीं थी उससे कही अधिक वस्तुएं आज तुम्हारे पास है,धन संपदा बहूत बड़ी है,लेकिन बीस साल पहले जो तुम्हारे मन को शांति थी,आज उतनी शांति नहीं है,समृद्धि तो बढ़ गयी लेकिन शांति घट गयी उसका कारण है हम व्यक्तियों में अपनी खुशी को तलाशते रहे और हमारी जिंदगी पराश्रित हो गई।
मुनि श्री ने कहा कि जिस परिस्थिति के कारण तुम खुशी महसूस कर रहे थे वही विपरीत परिस्थिति तुम्हें रुला देती है उदाहरण देते हुये कहा कि एक व्यक्ती ने लाटरी का टिकट खरीदा और उसने पेपर में देखा तो एक करोड़ की लाटरी खुल गई उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं और उसने अपने मित्रों को एक होटल में पार्टी दे डाली दूसरे दिन फिर वही न्यूज पेपर आया तो उसमें कालम क्षमा था “भूलसुधार” प्रथम पुरस्कार में जो नंबर छपा था उसमें आखरी पांच डिजिट में आखरी नं. दो के स्थान पर एक पढ़ें,उसने अखबार को पढ़ा और जो अखबार कल खुशी लेकर आया था आज वही अखबार मातम का कारण बन गया मुनि श्री ने कहा कि अरमानों से बढ़कर बेटे की शादी की खूब रुपया खर्च किया मन में खुशी आज मेंने अपने कर्तव्य का पालन किया और घर में बहु आ गई लेकिन किसी निमित्त से बेटे के मन में खिन्नता आई बेटा बाप से अलग हो गया, जो बेटा कल तक आंखों का तारा था वही बेटा आंखों का कांटा बन गया,बोलो ऐसा होता है? मुनि श्री ने एक और वृतांत सुनाते हुये कहा कि दीपावली का समय था एक आदमी अपने घर की सफाई में लगा था सफाई के क्रम में उसके हाथ एक पुस्तक लगी उस पुस्तक को पलटते हुये उसको 30वर्ष पुराना उसकी धर्मपत्नी के हाथ से लिखा प्रेम पत्र मिला उसके चहरे का रंग बदल गया जो पत्नी कल तक उसे प्राणेश्वरी नजर आ रही थी वही धर्मपत्नी आज उसे कुल्टा नजर आने लगी थी।





मुनि श्री ने कहा कि एक छोटा सा प्रसंग आपकी मानसिकता को बदल देता है मुनि श्री ने कहा कि परिस्थितियों का रोना बंद करो अपनी मनःस्थिति को बदलोगे तो आपकी सभी परेशानियां समाप्त हो जाएगी।
संत कहते है कि चाहे व्यक्ती हो,चाहे वस्तु हो,चांहे कोई भी परिस्थिति या भाग्य हो इसमें तुम्हें कोई सुख नहीं है, स्वंय को पहचानोगे तो तुम्हारी खुशी का रिमोट तुम्हारे हाथ आयेगा तो फिर कोई भी आकर तुम्हारी खुशी को नहीं छीन पाऐगा स्वंय को जानो, स्वंय बोध से भेद बोध जागता है,जिस दिन तुम्हें स्वं का भान हो जायेगा तो तुम्हारा भ्रम दूर हो जाऐगा मुनि श्री ने कहा कि यह क्या है कोई तुम्हारी थोड़ी प्रशंसा करे तो तुम प्रसन्न हो जाते हो और कोई थोड़ी तुम्हारी आलोचना करे तो तुम दुःखी हो जाते हो जिस दिन तुम अपने आपसे अपना परिचय प्राप्त कर लोगे कि “मै कौन हुं” और तुम्हें स्व बोध से भेद विज्ञान जग जाएगा तो तुम सिद्ध हो जाओगे।
जिसके जीवन में तत्व ज्ञान आ जाता है वह कभी परेशान नहीं होता प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण एवं आचार्य श्री के चित्र पर दीप प्रज्जवलन से हुआ तथा कार्यक्रम का संचालन अमित पड़रिया ने किया गुरुवार के प्रवचन का विषय रिश्तों की डोर अपेक्षा कम प्रेम ज्यादा” पर रहेगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

