सुख आत्मा का स्वभाव है! स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन
परम पूजनीय भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्ति भूषण माताजी ने सुखके स्वभाव के विषय में बताया।
उन्होंने बताया कि सुखी कौन है? सुख किससे प्राप्त होता है? अच्छे मकान अच्छे वस्त्र अच्छे भोजन से आदि से यदि सुख प्राप्त होता है तो भगवान के पास इनमें से कुछ भी नहीं है!
फिर भगवान सुखी हैं या दुःखी? आपके पास अगर खुद का मकान नहीं है तो कितने दुःखी रहते हैं! हर समय मन में चलता रहता है कि मेरा खुद का मकान नहीं है! सुख आत्मा का स्वभाव है! जैसे रसगुल्ला खाने पर स्वाद जिव्हा को तो आया लेकिन भोग करने वाली तो आत्मा ही है! देखने के लिए आँख स्वाद के लिए जिव्हा ये सब तो माध्यम हैं! आत्मा का स्वभाव है सुख इसलिए हर समय सुख चाहती है और दुःख से डरती है! एक होता है डायरेक्ट सुख एक होता है इंडायरेक्ट सुख!


जिव्हा ने रसगुल्ला खाया सुख आत्मा ने लिया कौन सा सुख है? इंडायरेक्ट! आँख ने टी वी देखी सुख मिला आत्मा को कौन सा सुख हुआ? इंडायरेक्ट! यह सब भोगने वाली आत्मा है इसलिए कर्म का बंध भी आत्मा को होता है! पांचो इन्द्रियों के माध्यम से जो भोग किया जाता है सुख लिया जाता है वह इंडायरेक्ट सुख है! और जिसमें इन सब चीजों की आवश्यकता ना पड़े और सुखी हो जाओ तो वह कहलाता है डायरेक्ट सुख! अगर संसारी वस्तुओं में सुख होता तो भगवान इन संसारी वस्तुओं को छोड़कर जंगल में नहीं जाते! लेकिन भगवान ने कहा संसारी सुख क्षणिक सुख हैं! इस संसारी सुख के साथ ही दुःख भी चलता है!
इसलिए भगवान ने जंगल में जाकर ध्यान किया तप किया! हम प्रतिदिन मंदिर में जाते हैं भगवान से कौन सा सुख मांगते है डायरेक्ट सुख या इंडायरेक्ट सुख? इंडायरेक्ट सुख तो कमाना पड़ता है मेहनत करना पड़ता है लेकिन डायरेक्ट सुख पाने के लिए तो हाथ पर हाथ रखो पाँव पर पाँव रखो और ध्यान के माध्यम से सुख की अनुभूति कर लो! हम मंदिर में आये मंदिर में भगवान को देखकर भी हमने आंकलन नहीं कर पाया की भगवान इतने सुखी क्यों हैं और हम इतने दुःखी क्यों है तो अभी हम मंदिर आये ही नहीं है! भगवान वीतरागी हो गये हैं हम रागी है यही उनके सुख और हमारे दुःख का कारण हैं!
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
