आचार्य श्री 108 शांति सागर महाराज छाणी का विस्तृत विवरण

धर्म

आचार्य श्री 108 शांति सागर महाराज छाणी का विस्तृत विवरण
प्रायः हम वर्तमान में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर जी (दक्षिण) के बारे में तो बहुत अच्छे से जानते है परंतु उनके लगभग समकालीन उन्ही के नाम के महातपस्वी आचार्य शान्तिसागर ( छाणी/उत्तर ) के बारे हमे बहुत कम जानकारी है,, इसका कारण उनके बारे में उनकी जीवनी के बारे में बहुत कम साहित्य उपलब्ध है,,गौर करने वाली बात दोनो आचार्यों ने एक साथ सन 1933 में राजस्थान ब्यावर में एक साथ एक ही नसिया में चतुर्मास भी किया था जबकि दोनो भिन्न भिन्न आमनाओ के आचार्य थे।

 

 

 

जानिए आचार्य शान्तिसागर ( छाणी ) और उनकी परम्परा के बारे में

बीसवीं सदी में दिगम्बर जैन मुनि परम्परा कुछ अवरूद्ध सी हो गई थी विशेषतः उत्तर भारत में। शास्त्रों में मुनि-महाराजों के जिस स्वरूप का अध्ययन करते थे, उसका दर्शन असम्भव सा था। इस असम्भव को दो महान आचार्यों ने सम्भव बनाया, दोनों सूर्यो का उदय लगभग समकालिक हुआ. जिनकी परम्परा से आज हम मुनिराजों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करते हैं और अपने जन्म को धन्य मानते हैं।

 

 

ये दो आचार्य हैं चारित्रचक्रवर्ती आचार्य १०८ श्री शान्तिसागर महाराज (दक्षिण) और प्रशान्तमूर्ति आचार्य १०८ श्री शान्तिसागर जी महाराज छाणी (उत्तर)। कैसा संयोग है कि दोनों ही शान्ति के सागर हैं। दोनों ही आचार्यों ने भारतभर में मुनि धर्म व मुनि परम्परा को वृद्धिंगत किया। दोनों आचार्यों की परम्परा में अत्यधिक मेल था, यहाँ तक कि ब्यावर (राजस्थान) में दोनों का ससंघ एक साथ चातुर्मास हुआ था।

व्यावर(राजस्थान) का अविस्मरणीय चौमासा

दोनों संतों का साक्षात्कार तो शायद दो-तीन बार हुआ है, परन्तु राजस्थान की ब्यावर नगरी में संवत् 1660 सन् 1933में दोनों संघों का एक साथ जो सम्मिलित चातुर्मास सम्पन्न हुआ उससे दोनों आचार्यों की वन्दनीय महानता की छाप इतिहास पर पड़ी है।

 

ब्यावर का अनोखा चातुर्मास वास्तव में बीसवीं शताब्दी के जैन-संस्कृति के इतिहास का एक दुर्लभ पृष्ठ है। दक्षिण के साथ उत्तर भारत का, कन्नड़ और मराठी के साथ हिन्दी और मेवाड़ी का तथा बीसपंथ के साथ तेरापंथ का. जैसा अद्भुत, अनाग्रही, और आत्मीयता-पूर्ण समन्वित स्वरूप जैनाजैन जनता ने उस चौमासे में साक्षात् देखा, वैसा अतिशयकारी रूप उसके पूर्व या उसके पश्चात् कभी, कहीं देखने को नहीं मिला। चारित्र-चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर स्मृति-ग्रन्थ में ब्यावर के प्रमुख श्रावक नगरसेठ श्रीमान् सेठ तोतालाल हीरालाल रानीवालो ने अपने संस्मरण लिखते समय लिखा है कि-

परम पूज्य चारित्र-चक्रवर्ती आ. शान्तिसागरजी महाराज (दक्षिण) के दर्शन करने का सौभाग्य सर्वप्रथम हमें सन् 1927 में तीर्थाधिराज सम्मेदशिखरजी पर प्राप्त हुआ जब हम पूरे परिवार के साथ वहाँ थे। तभी हमारे सारे परिवार की यह भावना हुई कि यदि आचार्य महाराज का विहार हमारे प्रान्त में हो और ब्यावर में चातुर्मास का सुयोग्य अवसर हमें प्राप्त हो. तो हम लोगों का जीवन कृतार्थ हो जाए। ‘यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी की नीति के अनुसार हम लोगों की भावना सफल हुई और वि. सं. 1660 में आचार्य महाराज के संघ का चातुर्मास ब्यावर में हुआ। उस समय हमारा सारा परिवार आनन्द विभोर हो गया, जब पूरे चौमासे भर हमें महाराजश्री के चरणों के समीप बैठने, उनका उपदेशामृत पान करने और सेवा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उस समय के कुछ संस्मरण इस प्रकार है-*

इस चातुर्मास की सबसे बड़ी उल्लेखनीय बात तो यह थी कि आचार्य महाराज के संघ के साथ के ही आचार्य श्रीशान्तिसागरजी छाणी (उत्तर) के संघ का भी चातुर्मास ब्यावर में ही हुआ था और दोनों संघ हमारी नसियोंजी में एकसाथ ही ठहरे थे। छाणीवाले महाराज बड़े महाराज को गुरुतुल्य मानकर उठते-बैठते, आते-जाते, उपदेशादि देने में उनके सम्मान-विनय आदि का बराबर ध्यान रखते थे, और बड़े महाराज भी उन्हें अपने जैसा ही मानकर उनके सम्मान का समुचित ध्यान रखते थे। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि छाणीवाले महाराज अवसर पाकर प्रतिदिन बड़े महाराज का नियमित रूप से वैयावृत्य करते थे।हमारे नसियॉजी में पूजन, अभिषेक आदि तेरह पंथ की आम्नाय से होता है और आचार्यश्री से सबंधित अधिकांश व्यक्ति और दक्षिण से आने वाले दर्शनार्थी बीसपंथी आम्नाय से अभिषेक पूजनादि करते हैं तब अपने संघ को एवम् दक्षिण से आने वाले लोगों को लक्ष्य करके श्री आचार्य महाराज कहा करते थे कि जहाँ जो आम्नाय चली आ रही हो, वहाँ उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये और सबको अपनी अपनी श्रद्धा-भक्ति के अनुसार यह कार्य करना चाहिये।*

यहाँ के चौमासे के समय आचार्य महाराज का दूध के सिवाय सभी रसों का और हरित मात्र का त्याग था। उनके जैसी दृढ़ता, शान्तता और वीतरागता के दर्शन अन्यत्र बहुत ही कम दृष्टिगोचर हुए।’
आचार्य शान्तिसागर जन्मशताब्दी स्मृतिग्रन्थ / १०८-६ आलेखित लेख

वे सभी लोग निश्चित ही बड़े सौभाग्यशाली थे जिन्होंने उस चातुर्मास को निकट से देखा और उन दुर्लभ क्षणों को अपनी स्मृति में बंदी बना लिया। जिसे भी उस अपूर्व घटना के बारे में बोलने-लिखने का अवसर मिला उसने सर्वथा अलग ही ढंग से अपने अनुभव व्यक्त किये हैं।*

स्मृति-ग्रन्थ में चारित्र-चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागरजी महाराज (दक्षिण) की जीवनी लिखते हुए डॉ० सुभाषचन्द्र अक्कोले ने उस पावन-प्रसंग की एक अंतरंग झाँकी इन शब्दों में प्रस्तुत की है ‘व्यावर का चातुर्मास सांस्कृतिक इतिहास का एक सुवर्णपत्र हो सकता है। आचार्यश्री १०८ शान्तिसागरजी छाणीवालों का भी चातुर्मास योगायोग से ब्यावर में हुआ। दोनों संघों का एकत्र रहना यह विशेषता थी। छाणीवाले महाराज की परंपरा तेरापंथ की थी जबकि आचार्य महाराज की परंपरा बीस पंथ की थी। फिर भी दोनों में परस्पर पूरा मेल रहा। छाणीवाले महाराज आचार्यश्री का वैयावृत्य भक्ति-भाव से बराबर करते रहे और आचार्यश्री ने भी उनके सम्मान की पूरी रक्षा की। जहाँ पर जिस प्रकार के व्यवहार का चलन हो उस प्रकार की प्रवृति चलने देनी चाहिए, उसमें अन्य परंपरा वालों को किसी मात्रा में भी ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए, सहिष्णुता का भाव होना ही चाहिए, इस प्रकार का संकेत संघस्थ सबको बराबर दिया गया था।

जातिलिंगविकल्पेन येषां च समयाग्रहः।तेऽपि न प्राप्नुवंति परमं पदमात्मनः ।।

अर्थात् जाति और वेश-परिवेश का विकल्प साधना में पूरा बाधक एवं हेय होता है। इसी प्रकार तेरह पंथ या बीसपंथ में विकल्पों से आत्म-साधना अर्थात् परमार्थभूत धर्मसाधना अत्यंत दूर होती है। धर्मदृष्टि के अभाव का ही यह परिणाम है। टंकोत्कीर्ण धर्मसाधना प्रायः लुप्त होती जा रही है और तेरह बीस के झगड़े दृढ़मूल बनाए जा रहे हैं तथा उन्हें धर्माचार का रूप दिया जा रहा है। समाज में आज भी जो भाई तेरह और बीस पंथ के नाम से समय-समय पर बितंडा उपस्थित करते हैं, और समाज के स्वास्थ्य को ठेस पहुँचाते हैं, उनकी प्रवृति को जो समाज के लिए महारोग के समान हैं. हम समझते हैं। इसके लिए आचार्यश्री का सामंजस्य, दूरदृष्टिता का व्यवहार एक अद्भुत कल्याणकारी अमृतोपम रसायन हो सकता है।”

“नगरसेठ श्रीमान् चंपालाल रानीवालों ने और उनके सुपुत्रों ने संघ का जो प्रबंध किया वह अपनी शान का उदारतापूर्ण अलौकिक उदाहरण ही था।”

– आ. शान्तिसागरजी जन्मशताब्दि स्मृतिग्रंथ / पृष्ठ ३३-३४

आचार्य शान्तिसागर ( छाणी ) की परम्परा*

प्रशान्तमूर्ति आचार्य शान्तिसागर जी छाणी (उत्तर) का जन्म कार्तिक वदी एकादशी वि०सं० १६४५ (सन् १८८८) को ग्राम छाणी जिला उदयपुर (राज.) में हुआ था। सम्पूर्ण भारत में परिभ्रमण कर भव्य जीवों को उपदेश देते हुए सम्पूर्ण भारतवर्ष, विशेषतः उत्तर भारत को इन्होंने अपना भ्रमण क्षेत्र बनाया। उनके बचपन का नाम केवलदास था, जिसे उन्होंने वास्तव में अन्वयार्थक (केवल अद्वितीय, अनोखा, अकेला) बना दिया। वि०सं० १६७६ (सन् १६२२) में गढ़ी, जिला बाँसवाड़ा (राज.) में क्षुल्लक दीक्षा एवं भाद्र शुक्ला १४ संवत् १६८० (सन् १६२३) सागवाड़ा (राज.) में मुनि दीक्षा तदुपरान्त वि०सं० १६८३ (सन् १६२६) में गिरीडीह (झारखण्ड प्रान्त) में आचार्य पद प्राप्त किया। दीक्षोपरान्त आचार्य महाराज ने अनेकत विहार किया। वे प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी। मृत्यु के बाद छाती पीटने की प्रथा, दहेज प्रथा, बलि प्रथा आदि का उन्होंने डटकर विरोध किया। छाणी के जमींदार ने तो उनके अहिंसा व्याख्यान से प्रभावित होकर अपने राज्य में सदैव के लिए हिंसा का निषेध करा दिया था और अहिंसा धर्म अंगीकार कर लिया था।

आचार्य श्री पर घोर उपसर्ग हुए, जिन्हें उन्होंने समताभाव से सहा। उन्होंने मूलाराधना’, ‘आगमदर्पण’, ‘शान्तिशतक’, ‘शान्तीसुधासागर, आदि ग्रन्थों का संकलन/प्रणयन किया, जिन्हें समाज ने प्रकाशित कराया, जिससे आज हमारी श्रुत परम्परा सुरक्षित और वृद्धिंगत है। ज्येष्ठ वदी दशमी वि० सं० २००१ (सन् १६४४) सागवाड़ा-बोर्डिंग (राज.) में आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज छाणी (उत्तर) का समाधिमरण हुआ।

इनके अनेक शिष्य हुए, जिनमें आचार्य सूर्यसागर जी बहुश्रुत विद्वान् थे। आचार्य सूर्यसागर जी का जन्म कार्तिक शुक्ला नवमी वि०सं० १६४० (सन् १८८३) में प्रेमसर, जिला ग्वालियर (म०प्र०) में हुआ था। वि०सं० १६८१ (सन् १६२४) में ऐलक दीक्षा इन्दौर में, ५१ दिन बाद मुनि दीक्षा हाट पिपल्या जिला देवास (म०प्र०) में आचार्य शान्तिसागर जी महाराज छाणी (उत्तर) से प्राप्त की। दिगम्बर जैन परम्परा में जैन साहित्य को सुदृढ़ एवं स्थायी बना सकने वालो में से हैं। आचार्य सूर्यसागर जी एक थे। उन्होंने लगभग ३५ ग्रन्थों का संकलन/प्रणयन किया और समाज ने उन्हें प्रकाशित कराया। संयमप्रकाश’ उनका अद्वितीय वृहत् ग्रन्थ है, जिसके दो भागों (दस किरणों) में श्रमण और श्रावक के कर्तव्यों का विस्तार से विवेचन है। ‘संयमप्रकाश’ सचमुच में संयम का प्रकाश करने वाला है, चाहे श्रावक का संयम हो चाहे श्रमण का। वि०सं० २००६ (१४ जुलाई १६५२) में डालमिया नगर (झारखण्ड) में उनका समाधिमरण हुआ।

परम्परा के तीसरे आचार्य १०८ श्री विजयसागर जी महाराज का जन्म वि०सं० १६३८ माघ सुदी ८ गुरूवार (सन् १८८१) में सिरोली (म०प्र०) में हुआ था। इन्होंने इटावा (उ०प्र०) में क्षुल्लक दीक्षा एवं मथुरा (उ०प्र०) में ऐलक दीक्षा ग्रहण की थी कि तथा मारोठ (राज.) में आ. श्री सूर्यसागर जी से मुनि दीक्षा ली थी। आचार्य सूर्यसागर जी का आचार्य पद पूज्य मुनि श्री विजयसागर महाराज को लश्कर में दिया था। आचार्य विजयसागर जी महाराज परम तपस्वी वचनसिद्ध आचार्य थे। कहा जाता है कि एक गांव में खारे पानी का कुंआ था, लोगों ने आचार्य श्री से कहा कि हम सभी ग्रामवासियों को खारा पानी पीना पड़ता है. आचार्य श्री ने सहज रूप से कहा देखो पानी खारा नहीं मीठा है’ उसी समय कुछ लोग कुए पर गये और आश्चर्य पानी खारा नहीं मीठा था। आपके ऊपर उपसर्ग आये, जिन्हें और शान्ति पूर्वक सहा। आपका समाधिमरण वि०सं० २०१६ (२० दिसम्बर १६६२) में मुरार (ग्वालियर) में हुआ।

आचार्य विजयसागर जी के शिष्यों में आचार्य विमलसागर जी सुयोग्य शिष्य हुए। आचार्य विमलसागर जी का जन्म शुक्ला द्वितीया वि०सं० १६४८ (सन् १८६१) में ग्राम मोहना, जिला ग्वालियर (म०प्र०) में हुआ था। आपने क्षुल्लक दीक्षा वि०सं० १६६८ (सन् १६४१) में पाटन, जिला-झालावाड (राज.) एवं मुनि दीक्षा वि०सं० २०००, सागोद जिला-कोटा (राज.) में आचार्य श्री विजयसागर जी महाराज से ग्रहण की। आपके सदुपदेश से अनेकों जिनालयों का निर्माण और जिनबिम्बों की प्रतिष्ठा हुई। आपके सान्निध्य में अनेक पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं व गजरथ महोत्सव सम्पन्न हुए। भिण्ड नगर को आपकी विशेष देन है। आपका जन्म मोहना (म०प्र०) में तथा पालन-पोषण पीरोठ में हुआ अतः आप ‘पीरोठवाले महाराज’ साथ ही भिण्ड नगर में अनेक जिनबिम्बों की स्थापना कराने के कारण ‘भिण्ड वाले महाराज’ के नाम से विख्यात रहे हैं। आचार्य विजयसागर जी ने अपना आचार्य पद विमलसागर जी महाराज (भिण्ड) को सन् १६७३ (वि०सं० २०३०) हाडौती में दिया।

आचार्य विमलसागर जी ने अनेकों दीक्षाएँ दीं उनके शिष्यों में

आचार्य सुमतिसागर जी, आचार्य निर्मल सागर जी, आचार्य कुन्थुसागर जी. मुनि ज्ञानसागर जी आदि अतिप्रसिद्ध हैं। आचार्य विमलसागर जी महाराज ने अपना आचार्य पद ब्र. ईश्वरलाल जी के हाथ पत्र द्वारा सुमतिसागर जी को दिया था। आचार्य विमलसागर जी महाराज का समाधिमरण १३ अप्रैल १६७३ (वि०सं० २०३०) में सांगोद, जिला कोटा (राज०) में हुआ था।

आचार्य शान्तिसागर जी महाराज छाणी (उत्तर) परम्परा के पांचवे आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज का जन्म वि०सं० १६७४ (सन् १६१७) आसोज शुक्ला चतुर्थी को ग्राम श्यामपुरा जिला-मुरैना (म०प्र०) में हुआ था। आपने ऐलक दीक्षा वि०सं० २०२५ (सन् १६६८) चैत्र शुक्ल त्रयोदशी रेवाडी (हरियाणा) में ली एवं मुनि दीक्षा वि०सं० २०२५ अगहनवदी द्वादशी (सन् १६६८) में गाजियाबाद (उ०प्र०) में ग्रहण की। आचार्य सुमतिसागर जी कठोर तपस्वी और आर्षमार्गानुयायी थे। आपने अनेक कष्टों और आपदायों को सहने के बाद दिगम्बरी दीक्षा धारण की थी। आपके जीवन में अनेक उपसर्ग और चमत्कार हुए पं० मक्खनलाल जी मुरैना जैस उद्भट्ट विद्वानों का संसर्ग आपको मिला। आप मासोपवासी कहे जाते थे। आपके उपदेश से अनेक आर्षमार्गानुयायी ग्रन्थों का प्रकाशन हुआ। सोनागिर स्थित त्यागीव्रती आश्रम आपकी कीर्ति पताका फहरा रहा है। आपने शताधिक दीक्षाएँ अब तक प्रदान की थीं। आपके प्रसिद्ध शिष्यों में उपाध्याय श्री ज्ञानसागर जी महाराज प्रमुख हैं। ऐसे आचार्यों, उपाध्यायों, मुनिवरों, गुरूवरों को शत्-शत् नमन्, शत्-शत् वन्दन।

सन् १६५८ ई० में मध्यप्रदेश के मुरैना शहर में उपाध्याय श्री का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम श्री शान्तिलाल जी एवं माता का नाम श्रीमती अशर्फी है इनके बचपन का नाम उमेश कुमार था। इनके दो भाई और बहनें हैं। भाइयों का नाम श्री राकेश कुमार एवं प्रदीप कुमार है तथा बहनों के नाम सुश्री मीना एवं अनीता है। ५.११.१६७६ को सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी में आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज से आपने क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की थी तथा आपको क्षुल्लक गुणसागर नाम मिला था। १२ वर्षों तक निर्दोष क्षुल्लक की चर्या पालने के बाद आपको आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज ने ३१.३.१६८८ को सोनागिर सिद्धक्षेत्र में मुनि दीक्षा देकर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के नाम से अलंकृत किया। सरधना में ३०.१.१६८६ को आपको उपाध्याय पद प्रदान किया गया। उपाध्याय श्री के चरण कमल जहां पड़ते है वहां जंगल में मंगल चरितार्थ हो जाता है।

~ सविनय नमोस्तु

संकलन ~ वैभव जैन “सम्यक” जगदलपुर 8103651818

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *