भगवान में नहीं भक्त की भक्ति में चमत्कार होता है सुधा सागर महाराज
दमोह
भगवान में नहीं भक्त की भक्ति में चमत्कार होता है भगवान में अतिशय भक्त की भक्ति से आता है धर्म में ताकत धर्मात्मा की शक्ति से आती है मुनिचर्या मे चमत्कार मुनि से आता है व्रत में चमत्कार व्रत करने वाले से आता है।
उपरोक्त विचार निर्यापक मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज ने दिगंबर जैन धर्मशाला में चल रहे श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर के तीसरे दिवस भक्तांबर की क्लास में अभिव्यक्त किए।

इस अवसर पर मुनि श्री के पद प्रक्षालन के पश्चात शास्त्र भेंट किया गया मुनि श्री को नवधा भक्ति के साथ आहार देने का सौभाग्य राजेश जैन हथना वालों को प्राप्त हुआ
मुनि श्री ने अपने मंगल प्रवचनों में आगे कहा कि जैन धर्म में तीर्थंकरों का जन्म पुण्य आत्माओं के उद्धार के लिए होता है पापियों के नाश के लिए नहीं जब दुनिया में धर्म की अभिवृद्धि होती है तो पुण्य शालियो के कल्याण के लिए प्रभु जन्म लेते हैं भक्तिवाद का मतलब भगवान से कुछ लेना नहीं है भक्त भगवान को सब कुछ अर्पण करना चाहता है भक्ति का अर्थ भगवान मेरे लिए नहीं वरन में उनके लिए बना हूं बड़े मेरी रक्षा करें यह भाव नहीं आना चाहिए यह विनाश की ओर ले जाता।





उन्होंने दुर्योधन का उदाहरण दिया और बताया कि दुर्योधन का उदाहरण है उसका यह दुर्गुण था की वह अपने बड़ों से अपना हित चाहता था किंतु उसने स्वयं का नाश किया और बड़ों का भी नाश कर दिया किंतु हनुमान जी अपने आराध्य भगवान रामचंद्र जी के संकट दूर करने एक पैर पर खड़े रहे लक्ष्मण पर संकट आया तो पूरा पहाड़ उठा कर ले आए किंतु स्वयं को जब रावण ने बंदी बना लिया तो खुद अकेले ही निपटा दिया वे जीवन भर अपने आराध्य की रक्षा करते रहे किंतु कभी रामचंद्र जी से कुछ नहीं चाहा आज का मनुष्य बड़ों से बहुत कुछ अपेक्षा करता है मां-बाप से बहुत कुछ चाहता है मां बच्चों को क्या देती है वह रानी बनकर आती है और बच्चों के लिए मेहतरानी बन जाती है प्रभु क्या देते हैं उनकी भक्ति नाम स्मरण मात्र से जन्म जन्म के पाप कट जाते हैं संसारी प्राणियों के क्षण भर में संकट दूर हो जाते हैं जिस तरह है अंजन चोर ने क्षण मात्र में णमोकार मंत्र के स्मरण से अपने पापों को नष्ट कर लिया प्रभु की चरित्र चर्चा ही पापों को समूल नष्ट कर देती है जिस तरह सूर्य के उदय से सरोवर में कमल अपने आप खिल जाते हैं।
भय के कारण व्यक्ति आज निर्णय नही ले पाता है वीर सागर महाराज
इसके पूर्व प्रात काल 6:00 बजे जीने की कला क्लास में निर्यापक मुनि श्री वीर सागर जी महाराज ने कहा कि भय के कारण व्यक्ति आज निर्णय नहीं ले पाता वह जीवन भर सोचता रहता है भय की वजह से कदम आगे नहीं बढ़ा पाता और व्यक्ति की उन्नति अवरुद्ध हो जाती है इसका कारण अवचेतन मन में गलत धारणाएं बैठ जाती हैं जब हम किसी भी कार्य को ज्यादा इंपोर्टेंस देते हैं तो भय की उत्पत्ति होने लगती है, और धीरे-धीरे यह हमारी आदत बन जाती है सबसे ज्यादा भय लोगों को यह होता है कि लोग क्या कहेंगे दुनिया की ज्यादा नहीं सुनना चाहिए क्योंकि लोग ना करो तो भी कहते हैं और करोगे तो भी कहते हैं दुनिया ने बड़े-बड़े महापुरुषों को नहीं

छोड़ा तो आप किस खेत की मूली हैं लोगों ने महावीर राम और सीता को भी लांछन लगाया तो वह सामान्य लोगों को कैसे छोड़ सकते हैं हर व्यक्ति से सलाह नहीं लेना चाहिए। जो जानकार है तुम्हारा हित चाहते हैं उसी से ही मार्गदर्शन लेना चाहिए बड़े बच्चों के साथ माता-पिता को मित्र की भूमिका में आ जाना चाहिए।
सुनील जैन वेजीटेरियन से प्राप्त जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
