अन्तर्मना उवाच* (25 मई!)*जिन्दगी अगर समझ ना आई, तो मेले में अकेला..*अगर जिन्दगी समझ आ गई, तो अकेले में मेला..!*
*जिन्होंने जो भी पाया, वो वन में जाकर ही पाया।* कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा है — कि *जो एक को जानता है, वो सब को जान लेता है। और जो सबको जानता है, वो एक को जानने से वंचित रह जाता है।* इसलिए भारत का इतिहास है – जिस किसी के भी मन में स्वयं को जानने की और पाने की लालसा जगी है, वह वन की तरफ गया है। *जीवन का असली आनंद और सत्य, वन में जाकर साधना से मिलता है।*

राम – कृष्ण – बुद्ध – महावीर — सभी तो वन की तरफ गए थे। क्योंकि यह महापुरुष जानते थे कि वन, बनने की प्रयोगशाला है। *जो भी वन गया, वह बन गया* —
👉 राम वन गए तो बन गए, क्या -? *मर्यादा पुरुषोत्तम*।
👉 महावीर वन गए तो बन गए, क्या-? *तीर्थंकर*।
👉 बुद्ध वन गए तो बन गए, क्या-? *महात्मा*।
👉 कृष्ण वन गए तो बन गए, क्या-? *योगीराज*।
*स्वयं की खोज में जो भी वन गया, वह भगवान बन गया है। और जो भवन में अटक गया, वह मिट गया।* रावण सरीखे के लोग भवन के मोह से ऊपर ना उठ पाए, परिणाम यह निकला सबकुछ होकर भी वह अनाथ होकर के मरा…!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
