चित्त शांत प्रसन्न करने के लिए तथा चित्त को प्रसाद देने के लिए मैत्री करुणा प्रमोद भाव रखना चाहिए कनक नदी गुरुदेव
सागवाड़ा
जिनवाणी नंदन वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक एलनंदी गुरुदेव ने योगेंद्र गिरी सागवाड़ा से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि चित्त को शांत प्रसन्न करने के लिए तथा चित्त को प्रसाद देने के लिए मैत्री करुणा प्रमोद भाव रखना चाहिए। दुर्जनों के प्रति माध्यस्थ भाव रखना चाहिए, ना उनकी बात को स्वीकार करना चाहिए ,तथा ना उनसे घृणा करनी चाहिए उनके गुणो से सीखना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा अहंकार करना पहाड़ जैसा हैं जो स्वयं के विकास में बाधक बनता है। स्वयं को हीन मानना स्वयं के पतन के लिए गड्ढा खोदना है। कषायों को कंट्रोल करना पड़ता है। सुख दुख में हानि लाभ में समता रखता आवश्यक हैं। हीरे में अधिक dignity City होती है अतः हीरे को हीरा ही काट सकता है।





राग द्वेष क्रोध मान माया लोभ को नष्ट करना सरल नहीं सबसे कठिन काम है। इन विभावों को त्याग करना महापुरुषों तीर्थंकरों साधुओं के लिए भी सरल नहीं है। ब्रेन में बहुत कम शक्ति है एक इंद्रियों में अरिहंत सिद्ध में नहीं होता शक्ति रूप में हर जीव भगवान है तो इससे घृणा द्वेष कैसे कर सकते हैं। जीव अशुद्ध होने के कारण विभिन्न विभाव परिणाम होते हैं ऐसा मानने पर मन क्षुभित नहीं होगा मन आनंदित होगा ।मैत्री भाव संपूर्ण जीवो से होना चाहिए। निगोदिया जीवों से लेकर सभी जीव पापी है दुष्ट दुर्जन होते हैं। पर्याय से वह दुष्ट दुर्जन है परंतु द्रव्य की अपेक्षा शुद्ध भगवान की तरह पवित्र है। साधु पीछी मिथ्यादृष्टि जीवो की रक्षा के लिए रखते है। धर्म लिखित रूप में तथा विज्ञान में प्रैक्टिकल रूप में होता है। खम्मामी सव्व जीवानाम अर्थात निगोदिया से लेकर सभी जीवो को क्षमा प्रदान करना फिर उनसे क्षमा मांगना स्वयं को प्रेम करो हर जीवो प्रति रक्षा का भाव रखो हर जीव की रक्षा करना धर्म हैं। ज्ञानी गुणवान बनने के लिए ज्ञानी गुणी जीवों से कभी घृणा नहीं करनी चाहिए।
महाराज श्री ने कहा स्वयं का मूल्यांकन नहीं करने के कारण स्वयं का आनंद नहीं लेने के कारण , स्वयं में तृप्त न होने के कारण , स्वयं से प्रेम नहीं करने के कारण व्यक्ति शराब बीड़ी सिगरेट तंबाकू गुटका वैश्यागमन आदि व्यसनों का सहारा लेता है। आत्मा से प्रेम करके आनंद उठाना चाहिए। किसी बीमारी के कारण परिवार में अनबन के कारण स्वयं को सुंदर दिखाने के लिए सामाजिक बंधनो से परे होने पर स्वयं को असहाय मनाना भी गलत है। शरीर वृद्ध होता है मन नहीं अतः बुढ़ापे मे जीव सभी प्रकार के पाप करता है फैशन,व्यसन,लिपिस्टिक नेलपालिश आदि से अधिक बुढे अधिक रोगी बनते हैं। हर आयु में खुद से प्रेम करना चाहिए। अपने आप को स्वीकार करो जीवन के हर क्षण का पूर्ण आनंद लो विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
