अन्तर्मना उवाच* (07 मई!)

धर्म

अन्तर्मना उवाच* (07 मई!)

*हमें अक्सर महसूस होता है कि दूसरों का जीवन अच्छा है..*
*लेकिन हम भूल जाते हैं कि उनके लिये हम भी दूसरे ही हैं..!*

हम यह नहीं कहते कि – तुम पूरी तरह से गूंगे हो जाओ, या फिर दिन भर ही बड़ बड़ाते रहो। *मैं तो यह कहता हूँ* — बोलो तो ऐसा बोलो जैसे — किसी से फोन पर बात कर रहे हो। चुप रहो तो ऐसे जैसे — सामायिक कर रहे हो। जीवन में संतुलन जरूरी है। खाना खाओ तो ऐसे कि जैसे — दवा खा रहे हो। *भोजन भी नपा तुला होना चाहिए, और भजन भी नपा तुला होना चाहिए*।

 

 

 

कुछ लोगों की *आदत होती है* कि उनका भजन दिन भर चलता रहता है। यह ठीक नहीं है।

 

 

 

दिन भर स्नान करना, *बार-बार स्नान करना क्या उचित है ? अरे बाबू! एक बार के स्नान से ही ऊर्जा मिल जाती है। उससे 12 घंटे ताजगी और स्फूर्ति बनी रहती है। एक बार का भजन प्रार्थना पूरे दिन पूजा का कारण बन जाती है*। कुछ लोग भजन तो घड़ी भर भी नहीं करते, लेकिन भोजन बकरी की तरह दिन भर चरते रहते हैं। *यह भी पागलपन है*। भजन की तरह भोजन भी नपा तुला होना चाहिए।

 

 

*भोजन की थाल को एक पवित्र वेदी समझो तो वह भोजन भी भजन का एक अंग बन जाएगा…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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