सम्यक कृति को संस्कृती कहते हैं, आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज। 

धर्म

सम्यक कृति को संस्कृती कहते हैं, आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज। 
बांसवाड़ा।   
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित बाहुबली कॉलोनी बांसवाड़ा विराजित हैं धर्म सभा में अपनी देशना में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उद्बोधन में बताया कि सम्यक कृति को संस्कृती कहते हैं, और जो संस्कृति को हम तक पहुंचाते हैं उन परम उपकारी तीर्थंकर ,आचार्य, गुरुओं के प्रति कृतज्ञता होना चाहिए जो कृतज्ञ होते हैं वह किए गए उपकारों को भूलते नहीं है ।आचार्य श्री के हम पर बहुत उपकार हैं। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने संस्कृति को बचाया है, जिनालयों को बचाया है इन आशाओं के साथ बचाया कि हम बचे हुए कार्य उन आशाओं को पूर्ण करेंगे। भगवान आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी तक और गणघर स्वामी की देशना को प्राचीन पूर्वाचार्यों ने शास्त्रों में, ताड़ पत्रों पर जिनवाणी के रूप में लिपिबद्ध किया इससे संस्कृति जिनवाणी देशना सुरक्षित है ।दक्षिण भारत में ऐसे सूर्य का उदय हुआ जिन्होंने प्राचीन संस्कृति जिनवाणी और जिनालयों को बचाने का महान पुरुषार्थ किया ।यह कार्य अनेक बाधाओ संकट के बावजूद पूर्ण किया। जिनकी आस्था देव शास्त्र गुरु के प्रति होती है वह संस्कृति को बचाने का प्रयास करते हैं णमोकार मंत्र से हमें परमेष्टि प्राप्त है अरिहंत भगवान और सिद्ध भगवान अभी साक्षात नहीं है आचार्य उपाध्याय और साधु परमेष्ठी साक्षात में है, जो आचार्य शांति सागर जी महाराज की देन है ।इन महापुरुषों के उपकार को समझ कर उन्हें चुकाने का अवसर हमें प्राप्त हुआ है आगामी अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 तक विनम्र श्रद्धा सुमन अर्पित कर महोत्सव को सफल बनाना है। आचार्य शांति सागर जी ने जिनालय की संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए 3 वर्षों से अधिक अन्न आहार का त्याग कर करोड़ों मंत्रो का जाप किया हमें भगवान के दर्शन अभिषेक पूजन अर्चना सुलभता से स्वतंत्रता से उपलब्ध कराया है। बांसवाड़ा में संघ विराजित है घर का आप छोटा सा लौकिक कार्य भी परिवार में विचार विमर्श कर करते हैं इसी प्रकार एक महान बड़ा कार्य को करने के लिए समाज में विचार विमर्श जरूरी है आचार्य श्री ने अपने मंगल उद्बोधन में हर मकान पर जैन ध्वज और जय आचार्य शांति सागरम लिखने की प्रेरणा दी ताकि दूर से ही वह मकान जैन बंधु का प्रतीत हो। दोपहर को आचार्य श्री शांति सागर आचार्य पदारोहण शताब्दी महोत्सव बाबद अनेक वक्ताओं समाजजनो ने संकल्पित होकर महोत्सव की कार्य योजना बनाई। दोपहर की सभा में मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने उपदेश में जिनवाणी की तांबे पर अंकित कराना, 9938 उपवास 18 करोड़ से अधिक जाप अनेक सर्प सिंह उपसर्गों का वर्णन कर बताया वह कभी डरे नहीं, झुके नहीं । आपने हमेशा संयम धारण करने की प्रेरणा दी । इसके पूर्व आर्यिका श्री महायश मति माताजी ने उपदेश में बताया कि बागड़ को पुण्य उदय से आचार्य वर्धमान सागर जी का संत समागम मिला है अब तन मन धन से पुरुषार्थ श्रद्धा भक्ति उत्साह समर्पण संगठन शक्ति से करने का अवसर मिला है आचार्य श्री शांति सागर जी ने अपना पूरा जीवन जैन धर्म जिनालय जिनवाणी के संरक्षण हेतु आत्मा की शक्ति भगवान की भक्ति से सुरक्षित किया है। माताजी ने घर-घर में आचार्य शांति सागर जी का फोटो लगाने का की प्रेरणा दी।   
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेकजैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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