संतो के सानिध्य में हुई आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज की विनयाजली सभा गुरु का समयसार मेरे साथ है अंकंपमति माताजी
गढ़ाकोटा
जैन मंदिर प्रांगण में रविवार की दोपहर बेला में आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज विनयाजली सभा का आयोजन संतों की सानिध्य में हुआ। इस सभा में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से दीक्षित शिष्य पूज्य मुनि श्री आगम सागर महाराज, पूज्य मुनि श्री पुनीत सागर महाराज, आर्यिका 105 अंकंपमति माताजी, आर्यिका 105 अचलमति माताजी के सानिध्य में सर्वप्रथम महामस्तकाभिषेक एवं पूजन के साथ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज विधान का आयोजन किया गया। सभा का शुभारंभ सर्वप्रथम बड़े बाबा एवं आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर किया गया।

आयोजन के क्रम में पाठशाला के बच्चों द्वारा मनमोहक प्रस्तुति दी गई। ब्रह्मचारिणी बहनों द्वारा भक्ति भाव के साथ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की पूजन की गई।





आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के प्रति बोलते हुए आर्यिका 105 अचलमति माताजी ने कहा कि जब जीवन का अंत हो मेरे सामने संत हो, तारो मुझे गुरुवर, वही से दो आशीष ऐसी भावना के साथ हमें अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिना तप के कोई दिगंबर नहीं बन सकता। जिसने मोक्ष का द्वारा बनाया उन्हें हम क्या विनयाजलि दे सकते हैं।
आर्यिका 105 अंकंपमति माताजी ने कहा की संयम, सौरभ, साधना जिनको करें प्रणाम, त्याग, तपस्या, धर्म का विद्यासागर नाम उन्होंने बोलते हुए कहा कि मुक्तागिरी में करीब 80 बहिने ब्राह्मी आश्रम में अध्ययन करने गई थी। तब गुरु ने कहा कि इन चार बिंदुओं में जो अच्छा लगे, उसे चुन लो। तब मैंने कहा कि गुरु का समयसार मेरे साथ है। गुरुवर खुली किताब की तरह थे, और रहेंगे।
इस अवसर पर बोलते हुए पूज्य मुनि श्री पुनीत सागर महाराज ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की ऊंचाई छूने का कारण उसका सरल स्वभाव है। आचार्य श्री के अंदर बहने वाला, निर्मल चरित्र उन्हें महान बनाता है। कीर्तिमान होते गए। इतने शिष्य कुंदकुंद महाराज के पास नहीं थे जो आचार्य श्री के पास हैं। थोड़ा पढ़ने से मंथन होता है। गुरु ने चिंतन बहुत किया है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
