वर्तमान में देव शास्त्र गुरु कल्पवृक्ष के समान हैं अर्पित सागर महाराज

धर्म

वर्तमान में देव शास्त्र गुरु कल्पवृक्ष के समान हैं अर्पित सागर महाराज
धरियावद
परम पूज्य आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर महाराज के परम शिष्य मुनि श्री 108 अर्पित सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि साधु की संगति कल्पवृक्ष के समान होती है, व्यक्ति कितना भी परेशान हो, और गुरु के पास जाकर उनके अपने अमृत वचन मिल जाते हैं तो भक्त की सारी विपदा नष्ट हो जाती है। और आनंद का अनुभव करता है।

 

 

महाराज श्री ने कहा कि भगवान के दर्शन से सम्यक दर्शन की प्राप्ति होती है, और भगवान की भक्ति से सारे कार्य सफल होते हैं। और भगवान का अपमान करने से अनंत पाप कर्म का संचय हो जाता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि मूर्ति मौन रहती है। मानव जैसा कर्म करता है, उसे वैसा फल प्राप्त होता है। जीवन में गुरु का होना महत्वपूर्ण है। बिना गुरु के मानव का जीवन शुरू नहीं हो सकता। सारे कार्य को सीखने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। मोक्ष जाने का सच्चा रास्ता गुरु से ही मिलता है।

 

 


जीवन में तीन शिक्षा ग्रहण करना मुनिश्री
पूज्य महाराज श्री ने अपने उद्बोधन में जीवन में तीन शिक्षा ग्रहण करने की बात कही उन्होंने कहा की जीवन में कभी क्रोध के आवेश में निर्णय नहीं करना चाहिए। अच्छे कार्य तत्काल करना चाहिए। कल पर टालना नहीं चाहिए। अपने जीवन में गुरु बनाना चाहिए। मनुष्य कल की कल्पना में जी रहे हैं। उसे कल की चिंता हमेशा रहती है। कल क्या होगा, कल क्या पहनना, क्या खाना है। हमें कल की चिंता नहीं करना चाहिए। वर्तमान की चिंता करना है। वर्तमान को सुधारेंगे तो भविष्य अपने आप सुधरेगा।

उन्होंने कहा कि काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परिलय होएगी बहुरी करेगो कब। हमें गुस्से को नियंत्रित रखना चाहिए। संयम,शांति और मोन से गुस्से को नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जो पलक झुका कर रखते हैं, दुनिया उसे पलकों पर बिठाकर रखती है। हमें वह दृष्टि बनना है, पर दृष्टि को त्यागना है। तभी आत्म कल्याण होगा।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी9929747312

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