देव शास्त्र और गुरु का अपमान निंदा करने से प्राणी की इस भव और आगामी भव में निंदा और अपमान होता हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी 
कल्याणपुरा। 
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का विहार पारसोला की और चल रहा 16 फरवरी को कल्याणपुरा प्रवेश हुआ । यहां आयोजित धर्म सभा में उपदेश में बताया कि पाप कर्म के उदय के जीव का इस पृथ्वीपर अनादर होता है-जो पुरुष पहले पूर्व ‘भव में देव, गुरु और शास्त्र की निंदा कर खुशी मनाता है,वह आगामी भव में अपमानित होता है उसकी निंदा होती हैं यह मंगल देशना आचार्य शिरोमणी श्री वर्धमान सागर जी ने कल्याणपुरा ग्राम में विहार के दौरान प्रकट की।
आचार्य श्री ने बताया कि अरिहंत भगवान देव भगवान,आचार्य उपाध्याय और साधु गुरु और उनके द्वारा दी गई देशना जो गणधर स्वामी ने लिखी है,वह जिनवाणी शास्त्र होती है इन तीनो मोक्ष के कारण हैं,इनकी निंदा,आलोचना मोक्ष की निंदा होती है इस कारण इनका निंदक प्राणी दुर्गति और निंदा का पात्र होता है।



ब्रह्मचारी गजू भैय्या राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आगे बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी के मुनि शिष्य आचार्य श्री कुथू सागर की भाव त्रय फल प्रदेर्शी में इसकी विवेचना की गई आगे बताया कि वितराग परमगुरु समस्त परिग्रहों के त्यागी होते हैं। इसलिए वे सदा दिगंबर अवस्था धारण करते हैं। “उन परम दिगंबर मुनियो को नग्न कहकर उनकी हँसी करना, उनमें अरुचि करना, उनके दर्शन नहीं करना, उनसे द्वेष करना, उनके लिए बुरे शब्द कहना, उनके लिए वैयावृत्त्य करनेका निषेध करना, उनकी चर्या व बिहार आदि की निंदा करना” गुरुओं की निंदा कहलाती है। “शास्त्रोंमें जो कुछ लिखा है वह सब ठीक नहीं है, जनवाणी मनवाणी को जिनवाणी मानना गलत हैं। इस प्रकार देव गुरु और शास्त्र के विरोध निंदा करने से प्राणी की इस भव और आगामी भव में निंदा और अपमान होता है पार सोला के जयंती लाल एवम समिति के अन्य सदस्यों अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का जी का ऋषभदेव से विहार होकर 16 को कल्याणपुरा मंगल प्रवेश हुआ पुनः विहार कर रात्रि विश्राम कुंडा दिगंबर मंदिर हुआ।17 फरवरी को विहार बाद आहार चर्या सेमारी ग्राम में होगी।आपके विहार की दिशा पारसोला है।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 
