ऐतिहासिक जुलूस में उमड़ा जैन समाज का सैलाबश्रीमद चौबीसी जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव: जन्मकल्याणक पर 1008 कलशों से भगवान का अभिषेक
ऋषभदेव । श्रीमद चौबीसी जिनेन्द्र पंचकल्याणक महा महोत्सव के अवसर पर सुमेर पर्वत हेतु जुलूस निकाला गया। हाथी, घोड़ों और बग्गियों के शाही लवाजमे के साथ विभिन्न मार्गों से निकले ऐतिहासिक जुलूस में जैन समाज के लोगों का सैलाब उमड़ा। जगह-जगह जुलूस को विभिन्न समाज के लोगों की ओर से पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया। जुलूस के वर्धमान सभागार पहुंचने पर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ की मौजूदगी में 1008 कलशों से भगवान का जन्माभिषेक मनाया गया। 1008 श्री चौबीसी भगवान के श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव के दूसरे दिन ऋषभदेव में ऐतिहासिक जुलूस वर्धमान सभागार से जुलूस रवाना हुआ। यात्रा में हाथी व बग्गियों में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के प्रमुख पात्र इन्द्रगण को शामिल होने का सौभाग्य मिला। पुण्यशाली परिवारों द्वारा हेलीकाफ्टर से पुष्प वृष्टि की गई बैड की मधुर ध्वनियों के बीच निकली यात्रा का जगह-जगह विभिन्न समाज के लोगों ने पुष्पवर्षा कर अभिनंदन किया। यात्रा विभिन्न क्षेत्रों से जैन समाज के पुरुष व महिलाएं उमड़ी। जलूस प्रमुख चौराहे होते हुए पुनः वर्धमान सभागार पहुंचा। वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में पाण्डुक शिला पर तीर्थंकर जिन बालक को विराजमान कर मिलाप कोठरी सौधर्म इन्द्र के सपरिवार अभिषेक करने के बाद पुण्यार्जक रूपादेवी मनोज दोषी परिवार वालों की ओर से स्वर्ण रजत कलश से जिन तीर्थंकर बालक का अभिषेक किया गया। बाद में महामहोत्सव के पात्रों द्वारा 1008 कलशो से भगवान का जन्माभिषेक जयकारों के बीच मनाया गया।जैन समाज के लोगों में उमड़े सैलाब के चलते सभागार में चौबीसी भगवान व आचार्य वर्धमान सागर महाराज के जयकारे गूंजे। 


संचित पुण्यों से मिलता तीर्थंकररूपी कर्म का फलः आचार्यश्री
वात्सल्य वारिधि व राष्ट्र गौरव आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज ने कहा कि आत्मा कई भव में भ्रमण करती है तब पूर्व वर्षों के संचित पुण्य से तीर्थंकर नाम कर्म का फल मिलता है। तीर्थंकर बालक के जन्म के 6 माह पहले से 14 करोड़ रत्न प्रतिदिन की वृष्टि होती है तीर्थंकर बालक के जन्म के 6 माह पहले और जन्म के 9 माह बाद अर्थात 15 माह तक कुबेर द्वारा रत्नों की वृष्टि की जाती है। तीर्थंकर भगवान द्वारा रतन त्रय धर्म की वृष्टि की जाती है एवं देवताओं द्वारा रत्नों की वृष्टि की जाती है ।



जब तीर्थंकर बालक का जन्म होता है तो नरक गति में भी नारकीय शांति और सुख का अनुभव करते हैं देवता सौधर्म इंद्र के साथ देव परिवार खुशी, भक्ति करते हैं जन्म नगरी सहित विश्व में सभी मनुष्य खुशियां मनाते हैं। क्योंकि तीन लोक के नाथ भावी तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ है। इस कारण तीन लोक में आनंद छा जाता है ।यह मंगल देशना पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने अयोध्या नगरी ऋषभदेव में श्री 24 जिन बिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के अवसर पर जन्म कल्याणक दिवस पर प्रकट किए।
ब्रह्मचारी गजू भैय्या राजेश पंचोलिया योगेश अनुसार आचार्य श्री ने प्रवचन में आगे बताया कि तीर्थंकर बालक के जन्म के अतिशयो की विवेचना की जिसके अनुसार तीर्थंकर बालक के शरीर से पसीना नहीं आता है ,शरीर निर्मल होता है, उनका रक्त रुधिर दूध के समान धवल होता है ,वह अवदारिक शरीर के धारी पुण्यशाली आत्मा होते हैं ,उनमें व्रज ऋषभ सहनन होता है, शरीर की आकृति सम चतुष्क होती है उनके शरीर में कोई न्यूनता नहीं होती है वह शक्तिशाली होते हैं यही कारण है कि नवजात तीर्थंकर बालक पर बड़े-बड़े 1008 बड़े बड़े धड़ों से अभिषेक करते हैं वह हित मित प्रिय वचन बोलते हैं ।
श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव के दूसरे दिन वर्धमान सभागार में आयोजित प्रवचन सभा में आचार्य श्री ने जब भगवान का जन्म होता है तो उनका जन्म कल्याणक मनाया जाता है किंतु लौकिक जीवन में आप बर्थडे जन्म दिवस मनाया जाता है। तीर्थंकर का जन्मदिन अंतिम जन्म होता है क्योंकि उनके जन्म के बाद वह दोबारा जन्म नहीं लेते हैं। गर्भ कल्याणक के बाद जन्म कल्याणक फिर दीक्षा लेकर तप करते हैं फिर केवल ज्ञान प्रगट होने पर ज्ञान कल्याणक फिर घातिया और अघातिया कर्मों का नाश कर सिद्धालय मोक्ष को प्राप्त करते हैं। मोक्ष कल्याणक के बाद निर्वाण को प्राप्त होते हैं यह उनका अंतिम जन्म होता है।
ऋषभदेव गुरुकुल मंदिर के श्रीमद जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्राण प्रतिष्ठा महा महोत्सव के दूसरे दिन विभिन्न कार्यक्रम हुए। जन्मकल्याणक के तहत प्रतिष्ठाचार्य संहितासूरि हंसमुख जैन एवम् सुधीर शास्त्री मार्तंड के निर्देशन में प्रातः जिनाभिषेक एवं नित्यार्जन, तीर्थंकर जिन बालक जन्म जन्मोत्सव मनाया गया। वर्धमान सभागार में वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्धमान सागर महाराज ससंघ के मंचासीन होने के बाद पुण्यर्जाक परिवारों द्वारा चित्र अनावरण, दीप प्रज्ज्वलन, आचार्य श्री वर्धमान सागर जी को शास्त्र भेंट व पाद प्रक्षालन राजेंद्र कटारिया परिवार ने किया । महिला मंडल द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया; कार्यक्रम के दौरान स्वागत अभिनंदन किया गया। महामहोत्सव के पात्रों द्वारा जन्म कल्याणक पूजा व हवन किया गया। सांयकाल पांडाल में श्रीजी की महाआरती की गई। शास्त्र सभा के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। 
पालना महोत्सव
तीर्थंकर बालक का पालना कार्यक्रम में इंद्र परिवार के बाद समाज ने पालना झूला कर पुण्य लाभ लिया। 
वात्सल्यमय जीवन दर्शन प्रदर्शनी। 
श्रीमद चौबीसी जिनेन्द्र पंचकल्याणक महा महोत्सव के अवसर पर जैन गुरुकुल परिसर में आचार्य श्री शांति सागर जी एवम आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के वात्सल्यमय जीवन दर्शन प्रदर्शनी लगाई गई हैं।जिसमे आचार्यश्री के बाल्यकाल से आचार्यश्री के सफर को दर्शाने के अलावा 55 वर्ष के संयम जीवन के अविस्मरणीय वात्सल्यमय पलों का सुंदर चित्रांकन किया गया। 
760 वर्ष प्राचीन अतिशय क्षेत्र सीपुर की पुण्य धरा पर पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज की प्रेरणा और सानिध्य में भव्य अंतरिक्ष सहस्त्र कूट दिव्य जिनालय एवं भक्तामर जिन मंदिर का शिलान्यास महोत्सव 19 फरवरी 2024 माघ शुक्ल दशमी को रखा गया है जिसकी पत्रिका का विमोचन आमंत्रित अतिथियों द्वारा आचार्य श्री सानिध्य में हुआ पंडित नितिनजैन अनुसार सीपुर समता तीर्थ धाम एवम् वात्सल्य पुण्य संस्थान सीपूर के तत्वाधान में मुख्य शिलान्यास कर्ता श्रीमती विमला राजेश बी शाह अहमदाबाद मुंबई एवम् अन्य पुण्यार्जक रहेंगे कार्यक्रम के प्रतिष्ठाचार्य पंडित हसमुख जी शास्त्री नंदनवन रहेंगे। 
13 फरवरी को तप कल्याणक अंतर्गत विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान होंगे।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
