अन्तर्मना उवाच (11 फरवरी!)आदत थी हमें रिश्तों में, दुध की तरह घुल मिल जाने की..याद ही नहीं कि जमाना तो शुगर फ्री हो गया है..! प्रसन्न सागर महाराज
इसलिए —
सन्त अपने प्रवचनों में सिद्धान्त नहीं, श्रद्धा देता है।
शास्त्र नहीं सत्य देता है।
पंथ नहीं पथ देता है।
ज्ञान नहीं अनुभव देता है।





तभी तो ये चलते फिरते सन्त, अरिहंत जीवन में अनुभव बटोरते हैं, और अमृत बाँटते हैं। सन्त इस देश की जीवन्त प्राण प्रतिष्ठेय होते हैं। किसी ने पूछा — आदमी और कुत्ता में क्या अन्तर है-? हमने कहा — कुत्ता हमेशा, अनजान को देखकर भौंकता है। लेकिन आदमी जब भी भौंकता है तो जाने पहचाने को देखकर, भौंकता है। कुत्ते को कोई अपरिचित मिल जाय तो वह जरूर भौंकता है। लेकिन आदमी की स्थिति इससे विपरीत है। वह हमेशा अपनों को देखकर इर्ष्या करेगा, जलेगा।*कोई किसी का खास हो जाये तो सहन नहीं कर पायेगा, अपनों के मान सम्मान कीर्ति में भीतर ही भीतर खाक हो जायेगा, और अपनों को देखकर भौंकता है।
यदि किसी को अपना बनाना है तो सबसे प्रेम करो।
सबकी सेवा करो, और सब में प्रभु के दर्शन करो। धर्म का मूल उद्देश्य और सन्देश भी यही है। दुश्मन को अपना बनाना है तो उसकी पीठ पीछे खूब प्रशन्सा करो। जब वो दूसरे के मुख से अपनी प्रशन्सा सुने तो पानी पानी हो जाये। वही इंसान आज समझदार है जो दुश्मनों में भी दोस्ती का हाथ बढ़ा दे…!।
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त वचन
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
