अहिंसा बहुत व्यापक मायने रखती है संथान साग़र जी
बड़वानी
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनि श्री संथान सागर जी विशेष उदबोधन गाँधीजी के कृतित्त्व पर प्रकाश डालते हुए एकं निजी स्कूल में बच्चो को संबोधित करते हुए कहा कि पाप का मूल हिंसा होता है, केवल गांधीजी को ही नही गाँधीजी को भी मानो उन्होंने कटाक्ष किया कहा कि मानव गांधीजी को तो खूब मान लेता है, पूज भी लेता है, आरती भी कर लेता है। लेकिन उनकी एक भी नही सुनता है।अहिंसा को व्यापक बताते हुए कहा कि अहिसा व्यापक और मायना रखती है।अगर समस्त पाप का कोई मूल है तो केवल हिंसा है। कहना चाहता हु इसलिए गांधीजी को हीनहीं, गांधीजी को भी मानो।

गाँधीजी ज्योतिर्मय पुंज दीपक थे।
पुज्य मुनिश्री ने गांधीजी को लेकर चार बातें कही-वे क्या थे? हम क्या है? हमें क्याहोना है? और उसे कैसे पाना है।पूज्य मुनि श्री ने महात्मा गांधीजी की व्याख्या करते हुए कहा कि गांधीजी ज्योतिर्मय पुंज दीपक थे,हम बुझे दीपक है। हमें भीप्रकाशमान दीपक बनना है। यहतभी संभव है, जब हमअपनी-अपनी बाती व तेल चैक कर लेंगे । अहिंसा को प्रायोगिक रूपसे अपनाए । खान-पान में सबसे ज्यादा हिंसा होती है।
हम किसी भीजीव को प्राण दान दे नहीं सकते,फिर उसे मारने का अधिकार हमने किससे ले लिया। मुनिश्री ने कहाहम सब परमात्मा की संतान है।फिर परमात्मा की किसी भी कृतिको तोड़ेंगे, फोड़ेंगे या मारेंगे (नष्टकरेंगे), तो हमारा परमात्मा हमारे सेखुश नहीं नहीं होने वाला। वह तोनाराज ही होने वाला है। मुनिश्री ने वस्त्रों की पवित्रता व रोजगार कीसमस्या से निजात पाने के लिए गांधीजी के हथकरघा और चरखाकी सभी को प्रेरणा दी। 100 सालपुरानी गांधीजी की दो पुस्तकों सेभी परिचय कराया।
संकलित अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
