_गणिनी प्रमुख ने चूमा गणिनी शिरोमणि का माथा _
अयोध्या, 2 फरवरी 2024
शीतलहर, रिमझिम बारिश और कड़ाके की कंकपाती ठंड को भी नजरअंदाज कर शाश्वत तीर्थ क्षेत्र श्री सम्मेदशिखर जी से सोनागिर की ओर अनवरत विहाररत माँ विशुद्ध चरण जब तीर्थंकरों की शाश्वत जन्म स्थली अयोध्या आकर थमें तो अभूतपूर्व अविस्मरणीय थे वात्सल्य के वो क्षण जब जयकारों की अनहद अनुगूंज के मध्य पूज्या गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी ने गणिनी शिरोमणि विशुध्दमति माताजी का माथा चूम कर कहा की_तुम सतत चिरंजीवी रहों।
क्योंकि तुमने आगम और आम्नाय के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु जैन सिद्धांतो को स्याद्वाद और अनेकांत की शैली से सुपुष्ट कर जैन दर्शन इतिहास में अपना आदर्श स्थापित किया हैं। तुम उम्र में मुझसे बहुत छोटी हो किंतु कार्यदक्षता उस उम्र को भी लजाती हैं। 
_श्रमणी आर्यिका चंदनामती माताजी एवं संघस्थ आर्यिका माताजी ने भी पूज्या गणिनी आर्यिका विशुध्दमति माताजी की चरण वंदना कर आत्मिक बहुमान किया_



_पूज्या गणिनी गुरु माँ विशुध्दमति माताजी ससंघ ने प्रातः तीर्थ वंदना की ,मध्यान्ह सामायिकादि क्रियाओं के पश्चात द्वय गणिनी श्री ने अकृत्रिम जिनालयों की चर्चा करते हुए विशद आगम व्याख्यान किया। एक ऐसी चर्चा जो मानों अनुभव की एक अनूठी मिसाल ही थी। तत्पश्चात, परम् पूज्या पट्ट गणिनी आर्यिका श्री विज्ञमती माताजी एवं संघस्थ आर्यिका माताजी ने पूज्या ज्ञानमती माताजी के चरण पखार, शास्त्रादि भेंट किये। 
वात्सल्य मिलन के पश्चात जब पुनः बिछुअन के पल आएं तो सबकी आंखे नम हो गयी। *अंतिम क्षणों में पूज्या ज्ञानमती माताजी ने पूज्या विशुध्दमति माताजी से बस यही कहा कि मोक्षमार्गी पदविहारियों का मिलना तो दुर्लभ ही होता हैं किंतु संबंध अवश्य बनाए रखना, बातचीत का जरिया बना रहें। 
आर्ष परंपरा की अपूर्व संरक्षिका आप, आप से मिलकर मन गदगद हो गया। 
पुनः मिलना शायद ही सम्भव हो किंतु सिद्धालय में शीघ्र मिलन हो। इन्हीं वाक्यांशों के साथ सौहार्द्र और आत्मीय भावनाओं का आदान प्रदान कर, पूज्या माताजी के कदम पुनः गतिशील हो गए अपने लक्ष्य की ओर ।
जय जिनेन्द्र
– माँ विशुद्ध आर्यिका संघ
