सिर्फ धार्मिक आयोजनों में भाग लेने से धर्म की रक्षा नहीं होती, धर्म को व्यवहार में उतारना जरूरी: प्रणम्य सागर महाराज
बड़ोदिया
अर्हम योग प्रणेता मुनिश्री 108प्रणम्य सागर महाराज ससंघ का बुधवार सुबह नया पड़ारिया से भीलकुआं तक विहार हुआ। आहारचर्या, सामायिक के बाद शाम को भीलकुआं से आगे विहार किया। महाराज श्री ने धर्मसभा में कहा कि जैन धर्म की गौरवशाली परंपरा गुरु-आचार्यों के त्याग, तप, संयम, आदशों से सशक्त बनी है।उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक आयोजनों में भाग लेने से धर्म की रक्षा नहीं होती। धर्म को व्यवहार, विचार, आचरण में उतारना जरूरी है। धर्ममय जीवन का मार्ग अपनाए, तभी धर्म की वास्तविक रक्षा संभव होगी। मुनिश्री ने कहा कि गुरु, आचार्यों ने पूरे जीवन में संयम, करुणा, सत्य, अहिंसा, आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया। सांसारिक मोह-माया को महत्व नहीं दिया और आत्मा की शुद्धि को लक्ष्य बनाया। समाज को भी वही आदर्श अपनाने होंगे। धर्म को जीवन के व्यवहार का हिस्सा बनाना होगा।
उन्होंने कहा कि भौतिकता की दौड़ में मनुष्य संस्कारों, धार्मिक मूल्यों से दूर हो रहा है। नई पीढ़ी को धर्म से जोड़ना है। परिवारों को धार्मिक वातावरण बनाना होगा। माता-पिता, बुजुर्ग बच्चों के सामने धर्म, संयम, सदाचार का उदाहरण रखें, तभी अच्छे संस्कार विकसित होंगे।
उन्होंने कहा कि धर्म पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप विनम्रता, सेवा, सहनशीलता, क्षमा, सद्भाव अपनाने में है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि गुरु-परंपरा के प्रति अटूट श्रद्धा रखें। धर्म के सिद्धांतों का पालन करें और अपने आचरण से समाज में सकारात्मक संदेश दें।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
