सिद्धान्त चक्रवर्ती,श्रुत वरदहस्त स्वाध्याय तपस्वी वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनन्दी जी गुरुराज 44वा मुनि दीक्षा वर्ष दिवस, भाव भरी विनयाजली
आचार्य श्री आदिसागर जी स्वामी के नंदन आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी स्वामी के सुशिष्य गणाधिपति गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी ऋषिराज के ज्येष्ठ व श्रेष्ठ शिष्य वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनन्दी जी गुरुराज जिनकी सन 5 फरवरी 1981 में भारत देश की पवित्र भूमि गोम्म्टेश्वर बाहुबली स्वामी के चरणों मे आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज,वात्सल्यरत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज,आचार्य श्री विद्यानन्दी जी महाराज के शुभाशीष सानिध्य में गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी द्वारा मुनि दीक्षा प्रदान की गयी।
परिचय–
उड़ीसा के ब्रह्मपुरी नामक कस्बे में क्षत्रिय परिवार में जन्म हुआ,नाम- गंगाधरबचपन से होनहार और तेजस्वी युवा बालक को अपनी लौकिक शिक्षा के साथ साथ सत्य को जानने की तीव्र इच्छा जागृत हुई।अनेक धर्मो के ग्रन्थों को पढ़ने व समझने पर जिज्ञासा शांत नही हुई तब यह युवा जैन दर्शन को जानने सन 1975 मे शाश्वत तीर्थ सम्मेदशिखर जी पहुचे जहाँ वात्सल्य रत्नाकर स्वामी ने इस युवा की भव्यता व तेजस्विता को जानकर अपने अतिशय मुस्कान से पुछा सत्य को जानने आये हो तो युवक गंगाधर ने आचार्य श्री से अपनी तीव्र जिज्ञासा शांत करने तीन सवाल रखे जिसे सुनकर वात्सल्यरत्नाकर स्वामी ने अपनी शिष्या की इशारा करते हुएकहा बेटा तेरे इन प्रश्नों का समाधान तो मेरी शिष्या गणिनी आर्यिका श्री विजयमती ही कर देगी । 
और विद्वान माताजी ने शीघ्र ही उनकी शंकाओं का समाधन कर दिया साथ ही अनेक धर्म चर्चा के बाद युवक गंगाधर को विश्वास हो गया कि यही वीतराग दर्शन सत्य है इसी से मुझे सत्यज्ञान की प्राप्ति होगी इसतरह वापस घर न जाने को प्रतिबद्ध युवक क्रमशः वात्सल्यरत्नाकर स्वामी,आचार्य श्री भरत सागर जी,आचार्य श्री कुंथुसागर जी और आर्यिका श्री विजयमती माता जी से ज्ञानार्जन करने लगे एवमं आचार्य श्री कुंथुसागर जी से विशेष स्नेह को पाकर उन्ही के साथ ब्रह्मचारी बनकर रहने लगे जिनसे अनेक शिक्षाओं को प्राप्त कर सन 1979 मे पहले क्षुल्लक दीक्षा फिर 5 फरवरी 1981 में मुनि दीक्षा ग्रहण की ।


आपमे ज्ञान स्वाधाय की इतनी ललक थी कि दिन-रात का अधिकांश समय ग्रन्थ अध्ययन में ही व्यतीत होता।आँखों मे सूजन तक भी आ जाती पर स्वाध्याय का क्रम निरन्तर जारी रहा है आगम के सूक्ष्म से सूक्ष्म तथ्यों व भाषाओ में इतना पारंगत किया कि लगभग 30 भाषाओ में आपने दक्षता हासिल की
कहते है कि तप साधना में जिस प्रकार इस युग मे तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सनमतिसागर जी ऋषिवर सबसे कठोर साधना की इसी तरह ज्ञान साधना में आचार्य श्री कनकनन्दी जी गुरुराज ने गहन स्वाध्याय तप किया इसीलिए वर्तमान में सर्वाधिक श्रमणों व जिज्ञासुओ ने आपसे ज्ञानार्जन किया ।हजारो विद्वान सन्तो व अतिउच्च शिक्षाविदों में भी एक आचार्य कनकनन्दी जी गुरुराज सबसे श्रेष्ठतम ज्ञान ,अध्ययन व अध्यापन की योग्यता रखते है ।
इस वर्ष 2018 में गोम्म्टेश्वर बाहुबली भगवान कामहामस्तकाभिषेक है जहाँ लगभग 400 सन्त पधारे थे जिनमे आचार्य श्री कनकनन्दी जी द्वारा शिक्षा को प्राप्त लगभग 12 बड़े बड़े आचार्य संघ अर्थात 60 से अधिक सन्त अपनी सानिध्यता प्रदान की।वर्तमान में 20 वर्षो से आचार्य श्री कनकनन्दी जी गुरुराज राजस्थान के मेवाड़-वागड प्रांत के छोटे छोटे गाँवो में विहाररत है जहाँ जैन के साथ साथ हजारो अजैन बन्धु आपके श्री चरणों मे सेवा हेतु नतमस्तक रहते है
30 भाषाओ के ज्ञाता ऐसे महाज्ञानी सन्त जिनके द्वारा 365 से अधिक साहित्यों व 13000 से अधिक आध्यात्मिक काव्य गीतों की रचना हो चुकी है,विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में आपके द्वारा रचित साहित्यों द्वारा अध्यात्म व जैन दर्शन की शिक्षा व शोध हो रहा है
ऐसे महागुणीजिनके पास असीम उदारता है,जैन जगत के विभिन्न धाराओं के प्रति समन्वयता दृष्टिकोण है,वात्सल्य का विशाल कोष है,छोटे से छोटे बालक में भी प्रतिमा को खोजने और निखारने की अनूठी शक्ति विद्यमान है,निस्पृहता और निराडम्बर से भरपूर है ऐसे विशाल गुणों के सरताज स्वाधाय तपस्वी श्री कनकनन्दी जी गुरुराज स्व में लीन होकर प्रायः छोटे छोटे गाँवो में विहाररत है.
शाह मधोक जैन चितरी से प्राप्त जानकारी संकलित अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
