मैं अगर एलोपैथी के बजाय आयुर्वेद का डॉक्टर होता तो गुरुदेव की सेवा कर पाता डॉक्टर कल्याण गंगवाल

धर्म

मैं अगर एलोपैथी के बजाय आयुर्वेद का डॉक्टर होता तो गुरुदेव की सेवा कर पाता डॉक्टर कल्याण गंगवाल
डोंगरगढ़
विश्व वंदनीय आचार्य श्री विद्यासागर महाराज चंद्रगिरी तीर्थ डोंगरगढ़ में विराजमान है। गुरुदेव का स्वास्थ्य लाभ हो इसके लिए जगह-जगह प्रार्थनाएं विधान अभिषेक शांति धारा की जा रही है।

 

वही विगत दो दिनों से अहिंसा शाकाहार के प्रचार में सक्रिय डॉक्टर कल्याण गंगवाल डोंगरगढ़ में ही है। और गुरुदेव का हाल-चाल जान रहे है। वे गुरुवर से काफी सालों से जुड़े हुए हैं।  

उन्होंने अपने मन से पीड़ा व्यक्त की की मेरे अपने 35 साल की प्रैक्टिस में मुझे आज लगा कि अगर मैं एलोपैथी के डॉक्टर की बजाय अगर आयुर्वेद का डॉक्टर होता तो गुरुदेवकी सेवा कर पाता। और मैं यही कामना करता हूं कि गुरुदेव जल्द स्वस्थ हो।

उन्होंने सभी से अपील की की इस दुनिया मे जितने भी लोग धर्म मे आस्था रखते हैं उनमें से शायद ही कोई एक व्यक्ति ऐसा हो जो आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रति आस्था न रखता हो , मेरे जीवन मे अभी तक तो ऐसा कोई भी व्यक्ति नही आया जिसने आचार्य श्रेष्ठ के प्रति अपनी भक्ति न दिखाई हो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उन्हें नमस्कार न किया हो,, मौजूदा हालातो में आचार्य श्रेष्ठ की दुर्बल काया को देखकर यदि अंदाज किया जाए तो उनकी अनन्य साधना को स्वतः ही पहिचान जाएंगे ,, मुझे तो यह भी याद नही कि उन्होंने अपने आहार में कभी रस गन्ध युक्त स्वादिष्ट भोजन या दूध फल मेवा युक्त पोष्टिक भोजन किया हैं। साधना की पराकाष्ठा तो देखिये जहां अन्य साधक सिर्फ सोते समय लकड़ी का पाटा इस्तेमाल करते हैं किंतु बैठते समय टिकावन की आवश्यकता महसूस करते हैं किंतु आचार्य श्रेष्ठ ने शायद ही कभी बैठते हुए अपनी पीठ को सहारा देकर टिकाया हो जबकि उन्हें पात्रता के अनुसार सिंहासन मिला करता हैं!

श्री गंगवाल ने कहा अपनी दुर्लभ साधना को करते हुए इतने सरल रहना भी एक बड़ी कला हैं जिसे आचार्य श्रेष्ठ बखूबी जानते हैं तभी तो मैने इतने वर्षों में उनके चेहरे पर हमेशा प्रशन्नता ही देखी हैं ,,, अपने रास्ते चलते हुए वे सदा दुसरो को खुश होकर ही आशीर्वाद देते हैं यह क्रम आज भी निरन्तर जारी हैं शारीरिक शिथिलता के बाबजूद भी जब वे रास्ते से निकल रहे होते हैं तो उनके चेहरे पर हंसी और उठे हुए हाथ से मिलता आशीर्वाद लोगो को दीवाना बना ही देता हैं!लेकिन पिछले कुछ दिनों से में यह बात बराबर नोटिस कर रहा हूं कि हम लोग अपने व्यवहार में परिवर्तन नही ला रहें हैं हम जब भी आचार्य श्रेष्ठ के सामने होते हैं तो इतनी जोर से नमोस्तु अथवा अन्य शब्दो का उच्चारण करते हैं कि वहां के वातावरण में मौजूद शांति भंग हो जाती हैं मुझे लगता हैं कि ऐसा करने से हम शायद ही वह पुण्य कमा पाते होंगे जिसकी कामना से हम लोग उनके दर्शन करने पहुचते हैं,, जबकि होना तो यह चाहिये कि बहुत दूर से ही शांति से खड़े होकर दोनो हाथ जोड़कर मन ही मन उन्हें नमोस्तु कीजिये आशीर्वाद आपके खाते जुड़ जाएगा ,,, मैने देखा हैं कि बड़े बड़े आयोजनों के पश्चात जब गुरुदेव आशीर्वाद देते हैं तो सबसे पहिले पांडाल के अंतिम छोर पर खड़े अंतिम व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए आशीर्वाद प्रदान करते हैं! तदुपरांत पास वाले को,,, इसका मतलब है नमोस्तु का आशीर्वाद घर बैठे भी पाया जा सकता हैं यदि भक्ति भाव से किया जाए

चन्द्रगिरि तीर्थ पर साधको का पहुचना प्रारंभ हो गया हैं उम्मीद हैं भक्त भी बढ़ेंगे किन्तु मेरा निवेदन हैं कि वहां शांति का परिचय देकर आचार्य श्रेष्ठ की साधना में सहयोगी बनें अन्यथा घर में रहते हुए उनके नाम से उनके मंगल की कामना करते हुए जाप पाठ करें ,,,, पूज्य आचार्य श्रेष्ठ का आशीर्वाद हम सभी को सदा मिलता रहे इसी मंगल कामना के साथ डॉक्टर कल्याण गंगवाल पुणे
संकलित अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी

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