प्रभु के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए, मुनि श्री विमल सागर
पंचकल्याणक के संबंध में मुनि संघ ने दिए आवश्यक दिशा निर्देश
निंबाहेड़ा ।
श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर जिनालय की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कार्यक्रम को लेकर रविवार को मुनिश्री विमलसागर, अनंतसागर, धर्मसागर, मुनिश्री भाव सागर ने समाज स्तर पर समीक्षा बैठक आयोजित कर आवश्यक दिशा निर्देश प्रदान किए।
समाज के प्रवक्ता मनोज सोनी के अनुसार रविवार को आयोजित धर्म सभा में मुनि श्री विमल सागर जी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि प्रभु वह दरवेश है जो सबकी खबर रखते हैं,प्रभु की पूजा दिव्य सामग्री से करना चाहिए, प्रभु के पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए, संपदा को देने वाला होता है श्रीफल और प्रतिदिन श्रीफल चढ़ाने से सुयश वैभव और सुख की प्राप्ति होती है, जिन्होंने भी गुरु शरण में जाकर श्री फल चढ़ाने का नियम लिया उनको कुछ ही समय में ही विशेष उपलब्धि हुई, इसलिए आप अपने नियम में दृढ़ रहे।

निंबाहेड़ा में नव जिनालय की पंच कल्याणक प्रतिष्ठा कार्यक्रम के संबंध में मुनि श्री भावसागर जी महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं को कहा कि पंचकल्याणक भगवान के जीवन की घटनाओं का जीवन्त चित्रण होता है,यह नर से नारायण, आत्मा से परमात्मा बनने का महोत्सव है।


तीर्थकरों के जीवन में घटित पांच घटनाओं का चित्रण होता है पंचकल्याणक में। पौराणिक पुरुषों के जीवन का संदेश घर-घर पहुंचाने का उद्देश्य होता हैं इन महोत्सवों में पात्रों का अवलम्बन लेकर जीवन यात्रा को रेखांकित किया जाता है। पंचकल्याणक तीर्थकर भगवान के गर्भ में आने से लेकर मोक्ष जाने पर्यन्त विशिष्ट समारोहों के रूप में मनुष्य के द्वारा यथासमय मनाए जाते हैं। ये कल्याणक इनके तीर्थकर नामक पुण्य प्रकृति के उदय से ही होते हैं, पंचकल्याणक तीर्थकरों के ही होते हैं।

गर्भ में आने से लेकर मोक्ष तक की यात्रा का जीवंत चित्रण है पंचकल्याणक जैसे एक सामान्य व्यक्ति का जन्म होता है, वैसे ही तीर्थकर का भी जन्म होता है। गर्भ में आने से लेकर मोक्ष तक की यात्रा का जीवंत चित्रण पंचकल्याणक के माध्यम से देखने को मिलता है। जन्म तो सबका होता है, लेकिन कुछ लोग जीवन ऐसा जीते हैं, जो अन्य के लिए भी आदर्श बन जाते हैं। अपना तो कल्याण कर ही लेते हैं, लेकिन उनके संपर्क में आने वालों का भी कल्याण हो जाता है। मानव जीवन के हितार्थ व आत्मिक शाति की प्राप्ति हेतु प्राणी मात्र के कल्याण हेतु होते हैं विविध धार्मिक आयोजनों के साथ पंचकल्याणक की ही क्रिया के साथ नई मूर्तिया प्रतिष्ठित होती हैं और पूजनीय मानी जाती है। पंचकल्याणक, ग्रन्थों के अनुसार वे पांच मुख्य घटनाएं है जो सभी तीर्थकरों के जीवन में घटित होती हैं। मुनि श्री ने पांच कल्याणक के बारे में बताते हुए कहा कि गर्भ कल्याणक जब तीर्थकर प्रभु की आत्मा माता के गर्भ में आती है।

जन्म कल्याणक जब तीर्थकर बालक का जन्म होता है। तप कल्याणक जब तीर्थकर सब कुछ त्यागकर वन में जाकर मुनि दीक्षा ग्रहण करते है। ज्ञान कल्याणक जब तीर्थकर को केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है।मोक्ष कल्याणक जब भगवान शरीर का त्यागकर अर्थात सभी कर्म नष्ट करके निर्वाण/मोक्ष को प्राप्त करते है।
पंचकल्याणक महोत्सव तीर्थकर प्रभु के जीवन का जीवंत प्रस्तुतीकरण है जीवन की कालिमा कम होती है सम्यक जीवन शैली का दिग्दर्शन है। बिंबो में श्रद्धा समर्पण संयम तप के द्वारा अर्हत सत्ता का गुण आरोपण किया जाता है। तीर्थकर के जीवन की विशेष घटनाओं का प्रस्तुतीकरण है तीर्थकर प्रभु के जीवन चरित्र को स्मरण करके मोक्ष मार्ग प्रशस्त किया जाता है। मंत्रो, भक्तियों एवं अनुष्ठान क्रिया विधि द्वारा आत्मा को परमात्मा बनाया जाता है प्रभु का जन्म होते ही समस्त दिशाएं आकाश निर्मल हो जाता है शीतल सुगंधित पवन बहने लगती है शंखनाद भेरीनाद, सिंहनाद, घंटानाद होता है।धर्म प्रभावना व संस्कारों के जागरण के लिए मांगलिक क्रियाओं के आयोजन करने का नाम पंचकल्याणक से संस्कारों से मानव महामानव बन जाता है, पवित्र आत्माओं के महोत्सव मनाए जाते हैं प्रत्येक धर्म की अपनी प्राचीन परम्परा और सांस्कृतिक संस्कार होता है, जिससे उसका धर्म फलता-फूलता है और सांस्कृतिक परिवेश का नया निर्माण भी हुआ करता है। पंचकल्याणक महोत्सव प्राचीन सांस्कृतिक परिवेश की पृष्ठभूमि में होता है और नवीन संस्कृति के लिये वह प्रेरणा का कारण बनता है। अपने धर्म की वृद्धि के लिये धर्मात्माओं के लिये अपने शलाका पुरुषों के चरित को सामने रखकर के अपने कल्याण के लिये एवं धर्म के रहस्य को जानने के लिये उनके जीवंत प्रसंग को प्रकट करके कैसे आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा पूर्ण की जाती है? उसी का प्रतीक है पंचकल्याणक महोत्सव की क्रिया और धर्म संस्कार का संचार जनमानस तक पहुँचाने का माध्यम है। 
संसार के सारे राग-रंग और इन्द्रियों के विषयों के प्रसंगों से ऊपर उठकर अपने आत्मकल्याणक के लक्ष्य को प्राप्त कर लेना ही पंचकल्याणक है। संसार के सारे पाप-पंक से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही पंचकल्याणक है। संसार के परिभ्रमण से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही पंचकल्याणक है। जन्म-मरण और संसार के विषय कपायों की प्रवृत्ति से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही पंचकल्याणक है। अपनी अनेक भवों की साधना स्वरूप ही इन्हें तीर्थकर पद प्राप्त होता है। जिन्हें तीर्थकर पद प्राप्त होता है उनके पांचों कल्याणक अवश्य होते हैं। धर्म सभा में वही पार्श्वनाथ से आए पदाधिकारियों सहित वंडर सीमेंट की ओर से मुनि वृंदो को श्री फल अर्पित कर धर्म उपदेश के लिए वंदना की गई।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
