पुष्यगिरि तीर्थ में अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी ससंघ की अलौकिक तप-साधना

धर्म

पुष्यगिरि तीर्थ में अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी ससंघ की अलौकिक तप-साधना

62 दिनों में आचार्यश्री ने किए 44 उपवास, संघ के साधु-साध्वियों ने भी किया कठोर तप; त्याग, संयम और आत्मशुद्धि का दिया संदेश

जुलाई-अगस्त के 62 दिनों में संघ के साधु-साध्वियों ने शक्ति अनुसार किए उपवास, देशभर से पहुंच रहे श्रद्धालु

पुष्यगिरि (सोनकच्छ/देवास)।

आत्मशुद्धि, संयम और त्याग की अनुपम साधना का उदाहरण पुष्यगिरि तीर्थ में देखने को मिल रहा है। यहां वर्षायोग के लिए विराजमान व्रत चक्रवर्ती अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उनके ससंघ साधु-साध्वियों ने जुलाई और अगस्त माह के 62 दिनों के दौरान कठिन तप-साधना की। संघ के साधु, आर्यिका एवं क्षुल्लिका माताओं द्वारा किए गए उपवासों की यह तप श्रृंखला श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का केंद्र बनी हुई है।

 

 

आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने 44 उपवास किए। तपस्वी सम्राट आचार्यश्री ने 62 दिनों के इस कालखंड में 44 दिवस उपवास कर अखंड तप-साधना का परिचय दिया। उनकी साधना से पुष्यगिरि तीर्थ का वातावरण भक्तिभाव और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत है।

मुनिराजों ने भी अपनाया कठोर तप

संघ के मुनिराजों ने अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास कर संयम और तपस्या का परिचय दिया।

उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी — 30 उपवास

मुनि श्री परिमल सागरजी — 26 उपवास

मुनि श्री सामायिक सागरजी — 24 उपवास

स्थविर मुनि श्री नैगम सागरजी — 21 उपवास

प्रवर्तक मुनि श्री सहज सागरजी — 19 उपवास

मुनि श्री अर्थ सागरजी — 13 उपवास

मुनि श्री अप्रमत सागरजी — 9 उपवास

निर्यापक मुनि श्री नव पद्म सागरजी — 7 उपवास

क्षुल्लक श्री अन्वय सागरजी — 6 उपवास

आर्यिका-क्षुल्लिका माताओं ने भी की तप-साधना

संघ की आर्यिका एवं क्षुल्लिका माताओं ने भी कठोर व्रत एवं उपवास के माध्यम से त्याग और संयम की मिसाल प्रस्तुत की।

आर्यिका श्री व्रतप्रभाजी — 29 उपवास

आर्यिका श्री पुण्यप्रभाजी — 26 उपवास

आर्यिका श्री चारित्रप्रभाजी — 23 उपवास

आर्यिका श्री धर्मप्रभाजी — 23 उपवास

गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानप्रभाजी — 21 उपवास

क्षुल्लिका श्री वचनप्रभाजी — 21 उपवास

क्षुल्लिका श्री तपप्रभाजी — 13 उपवास

क्षुल्लिका श्री भावप्रभाजी — 9 उपवास

क्षुल्लिका श्री द्रव्यप्रभाजी — 7 उपवास

 

तप केवल उपवास नहीं, आत्मा की साधना है

आचार्य श्री ससंघ की यह सामूहिक तप-साधना केवल उपवासों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह त्याग, संयम, आत्मावलोकन और आत्मशुद्धि का जीवंत संदेश दे रही है। जैन दर्शन में तप को आत्मकल्याण का महत्वपूर्ण साधन माना गया है। संघ के साधु-साध्वियों की साधना को देखने और उनके दर्शन का लाभ लेने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पुष्यगिरि तीर्थ पहुंच रहे हैं।

 

पुष्यगिरि तीर्थ में चल रही यह तपोमयी साधना धर्मप्रेमियों के बीच श्रद्धा और प्रेरणा का वातावरण बना रही है। आचार्यश्री एवं संघ के सानिध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियां भी निरंतर आयोजित हो रही हैं।

प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *