कामां का रहा है गौरवशाली इतिहास तो जैन मंदिर भी हैं सातवीं शताब्दी से अधिक प्राचीन चार प्राचीन जिनालय जैनत्व की जीवंत गाथा
कामां
पौराणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक नगरी कामवन कामां जिसका इतिहास अपने आप में स्वयं गौरव है। भगवान श्री कृष्ण द्वापर युग में अवतरित हुए और उन्होंने इस पावन क्षेत्र पर अपनी बाल क्रीड़ाएं संपन्न की। जिनके प्रमाण आज भी जीवंत कामवन की पावन धरा पर दृष्टिगोचर होते हैं।
यदि विश्लेषण करें तो कामां की धरा पर प्राचीन चार दिगम्बर जैन जिनालय स्थित है जिसमें श्री 1008 शांतिनाथ दिगंबर जैन दीवान मंदिर जी के तलघर से निकले देवाधिदेव 1008 श्री आदिनाथ भगवान की प्राचीन प्रतिमा स्वयं इतिहास को वर्णित करती है। जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है की लगभग सातवीं शताब्दी से यहां जिनालय स्थित है क्योंकि वह प्रतिमा 1400 से भी अधिक वर्ष प्राचीन है।

अन्य प्रतिमाओं पर अंकित प्रशस्ति भी लगभग 500 से 700 वर्ष प्राचीन है इसी श्रृंखला में कामां के कोट ऊपर स्थित श्री 1008 आदिनाथ भगवान का जिनालय भी 11वीं शताब्दी का अंकित है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि यह जिनालय उससे भी अधिक प्राचीन है।




राजा कामसेन के जिन महलों का वर्णन कामा के इतिहास में होता है यदि उन पर दृष्टिपात करें तो यह भी जैन धर्म से जुड़ा हुआ एक प्रसंग है बने हुए 84 खम्बों में उत्कीर्ण चिन्ह जैनत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। सिंहासन के पीछे एवं दीवारों पर उकेरे हुए भित्ति चित्र जैन प्रतीकों के समान ही दिखाई देते हैं।

संजय जैन बड़जात्या,महामन्त्री पंचकल्याणक महोत्सव समिति कामां बताते है कि आचार्य श्री कुन्थु सागर जी महाराज संघ में उपाध्याय श्री कन नंदी महाराज ने देखकर बताया था।
यदा कदा खुदाई में जैन प्रतिमाओं व प्रतीक चिन्हों का प्राप्त होना भी इस बात का प्रमुख द्योतक है कि यह भूमि जैनत्व का समृद्धिशाली इतिहास को समेटे हुए है।
संजय जैन बड़जात्या से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
